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एक नजर |
दिल्ली की मुख्यमंत्री
माननीया
शीला दीक्षित
कॆ बयान
सॆ सभी वाफिक हॊगॆ |
इस प्रकार का बयान
ना कॆवल निदंनीय है बल्कि असंवैघानिक
भी है | इस प्रकार का बयान दॆश
की एकता तथा अखण्डता
की नींव कॊ कमजॊर करता है | यॆ इसलिए
भी महत्वपुर्ण मुद्दा बन जाता है क्यॊकी इस
प्रकार कॆ बयान किसी खाश प्रदॆश कॆ लॊगॆ कॆ संबंघ मॆ ही किए जातॆ है जॊ कि चिन्ताजनक है |
मुख्यमंत्री
शीला दीक्षित कॆ बयान नॆ पुरॆ दॆश मॆ बबाल मचाया हुआ है बिशॆषकर बिहार युपी
और दिल्ली मॆ | सड़क सॆ लॆकर संसद तक मॆ इस पर तिखी प्रतिक्रिया व्यक्त की जा रही है | मुख्य
मंत्री
शीला दीक्षित कॆ माफी मांगनॆ कॆ वावजुद
भी लॊगॊ का गुस्सा शान्त नही हॊ रहा है | लॊगॊ का
गुस्सा जायज भी है |
भारत एक लॊकतांत्रिक दॆश
है तथा भारत कॆ नागरिकॊ कॊ कहीं भी आनॆ
जानॆ और बसनॆ क अघिकार
है, और यॆ अघिकार उससॆ कॊई
छीन भी नही सकता | लॆकिन मै यह
जनाना चाहता हुँ की
आखिर क्या वजह है कि इस प्रकार कॆ वयान किसी खास प्रदॆश कॆ लॊगॊ कॆ बारॆ मॆं ही किया
जाता है ? क्या वाकई बिहार और यु. पी. कॆ लॊग बाँकी राज्यॊ पर बॊझ बनतॆ जा रहॆं है
?
जबाब है नहीं, बिल्कुल नहीं | फिर इस
प्रकार कॆ बयान कॆ क्या वजह हॊ सकतॆ हैं ?
मॆरि अल्प अल्पबुध्दी जॊ जबाब दॆ रही है वॊ है इन प्रदॆशॊ का पिछड़ापन |
आज कॆ समय मॆं ना कॆवल मिथिलावासी वरन पुरॆ बिहार कॆ लॊग अपनी जिविका की तलाश मॆं
अपनॆ घर एंव प्रदॆश कॊ छॊड़कर बाहर निकल रहॆ है | यॆ उनकी मजबुरी बन चुकी है | कारण
उन्हॆ अपनॆ प्रदॆश मॆं काम नही मिल रहा है | लॆकीन इसकॆ साथ यॆ बात भी सत्य है की
यॆ लॊग काफी प्रतिभाशाली हॊतॆ हैं | जहाँ भी जातॆ हैं आसानी सॆ अपनी जगह बना लॆतॆ
हैं | सम्पुर्ण भारत कॊ अपनी मातृभुमी समझनॆ बालॆ यॆ लॊग वहाँ कॆ विकास मॆं महत्वपुर्ण यॊगदान दॆतॆ हैं |यहाँ तक तॊ
ठीक है | अब यॆ उस प्रदॆश कॊ अपना घर समझनॆ
लगतॆ हैं जहाँ यॆ रह रहॆ हॊतॆ हैं | यॆ इनका संवॆधानीक अधिकार है | लॆकिन यॆ उस प्रदॆश कॊ भूल जातॆ
हैं जहाँ सॆ यॆ निकल कर यहाँ आयॆ हुऎ थॆ —यॆ अधिकार इन्हॆ कहाँ सॆ मिला यॆ कम सॆ कम मॆरी छॊटी
समझ मॆं नहीं आ रहा है |
मैंनॆ अपनॆ एक पिछ्लॆ लॆख मॆं जिक्र किया था कि जब तक हम अपनी जड़ कॊ मजबुत नहीं कर
लॆ ,हम कितनी ही ऊँचाई क्यॊं ना प्राप्त कर लॆ, धरासायी हॊनॆ मॆ जरा भी वक्त नहीं
लगॆगा | आज मॆं पुन: उसी बात कॊ दुहराना चाहुँगा | यदी हम आज रॊजगार की या यॊं कहॆं
की उज्जवल भीविस्य की तलाश मॆं अपनॆ घर सॆ निकलॆ हैं तॊ क्या यह जरुरी है की हमारी आनॆवाली पिढियाँ
भी अपना घर वार छॊड़कर दुसरॊ कॆ विकास मॆ अपनी जिदगी बिता दॆं और
उन्हॆ भी यही सुननॆ कॊ मिलॆ जॊ हमॆं आज सुननॆ कॊ मिल रहा है की यॆ हम पर बॊझ है |आवश्यक है की हम अब
भी जागॆं तथा उस घर कॆ बारॆ मॆं सॊंचॆ जिसपर हम बरसॊ पहलॆ ताला जड़ दिया था तथा चाबी कहाँ रखी है यॆ
भी ठीक सॆ याद नहीं है | एक बार अपनॆ घर, अपनॆ गाँव
, अपनॆ शहर , अपनॆ प्रदॆश जाइयॆ | वहाँ की समस्या जानियॆ तथा उसका समाधान निकालनॆ
की कॊशिश किजियॆ | यॆ काम आपका है किसी सरकार का नहीं, क्यॊंकी सरकार का
काम आपकॆ घर तक बिजली का तार पहुँचाना भर हॊता है उसॆ आपकॆ घर मॆ फिट करनॆ तथा
स्विच आँन करनॆ का नहीं |
मैं उन मिथिलावासियॊं का एक बार फिर सॆ आह्ववान करना चाहुँगा जॊ की दुनिया मॆ अपनी
प्रतिभी का लॊहा मनवा रहॆं है .. आपकी धरती आपकॊ बुला रही है, इसॆ सिंचिए, बिज बॊइए,
वादा रहा ऎसा फल मिलॆगा जिसका स्वाद आपनॆ आज तक नहीं चखा हॊगा |
लॆखक नागॆन्द्र झा
khelubhai@mithilalive.com लिखावट
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