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अथ वानप्रस्थ कथा
jagran --
08/19/2008 09:16 PM
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अर्द्धरात्रि का समय था। अहमदाबाद-हरिद्वार मेल जयपुर रेलवे
स्टेशन को पीछे छोड रफ्तार पकड चुकी थी। इसके सामान्य श्रेणी के डिब्बे में काफी
भीड थी। यात्री ठुंसे-ठुसाये बैठे थे। जिसको जहां स्थान मिल रहा था वहीं पसर रहा
था। बैठे हुए यात्री एक दूसरे के कन्धे पर सिर टिकाकर सोने का प्रयास कर रहे
थे। कुछ यात्री खडे-खडे ही ऊंघ रहे थे। कुछ यात्रियों को अगले स्टेशन पर उतरना
था, वे नींद आने के बावजूद जग रहे थे।
इसी बीच एक बूढे ने सोये हुए यात्रियों की नींद में व्यवधान डाल दिया। वह अपने
मुंह के आगे हथेली लगाकर पानी मांगने लगा। बूढा वेशभूषा से गुजराती लग रहा था।
दयावश एक यात्री ने उसे अपनी पानी की बोतल पकडा दी। वह पानी पीता जाता और बोतल
में शेष बचे पानी को देखता जाता। जब बोतल में थोडा सा पानी शेष बचा तो उसने
यात्री को बोतल वापस कर दी। न जाने क्या सोचकर, उस यात्री ने वह बोतल खिडकी से
बाहर फेंक दी। इसी समय बूढे ने मुंह सा बनाया, जीभ बाहर निकाली और पास में नीचे
लेटे दो बच्चों के पास थूक दिया। यात्रियों ने उसके थूकने पर आपत्ति की तो वह
कुछ बडबडाकर चुप हो गया।
कुछ देर बाद बूढे को लघुशंका लगी। वह सोये हुए यात्रियों के ऊपर गिरता-पडता आगे
बढने लगा। यात्रियों की भीड को पार पाना उसके लिए टेढी खीर थी। एक समझदार
व्यक्ति को डर लगा कि यदि बूढा टॉयलेट तक न पहुंच पाया तो अपनी शंका का निवारण
वहीं खडे-खडे भी कर सकता है। उसने अन्य यात्रियों से निवेदन करते हुए बूढे के
लिए टॉयलेट तक जाने का रास्ता बनाया। बूढा लघुशंका से निवृत्त होकर अपनी सीट पर
आ बैठा।
लेकिन जैसे शान्त बैठना बूढे की फितरत ही नहीं थी। रेलगाडी के दौसा रेलवे
स्टेशन पर पहुंचते ही वह बूढा फिर से यात्रियों से पानी मांगने लगा, लेकिन कोई
भी यात्री उसके थूकने की आदत के कारण उसे पानी पिलाने को तैयार न था।
पानी, पानी दो पानी, पीने को पानी दो. पानी..
बूढा लगातार पानी पानी की रट लगा रहा था। सारे यात्री उसकी रट से दुखी हो गये।
तब एक यात्री ने उसे इस शर्त पर अपनी पानी की बोतल थमा दी थी कि वह पानी पीने
के बाद थूकेगा नहीं। बूढे ने अपनी प्यास बुझाने के लिए शर्त मान ली। उसने पानी
पिया और बोतल वापस कर दी। वहां पर बैठे सभी यात्रियों की दृष्टि बूढे पर यह
देखने के लिए टिक गयी कि बूढा अब क्या करेगा। लेकिन यात्रियों को इसके लिए अधिक
देर तक प्रतीक्षा नहीं करनी पडी। जैसे ही उनकी दृष्टि इधर-उधर हुई, बूढे ने जीभ
निकाली और फिर से उसी स्थान पर थूक दिया। यात्रियों को बूढे से घिन हो गयी। कुछ
यात्रियों ने बूढे को डपट दिया तो बूढा उनसे ही अकड पडा।
कुछ यात्री बूढे की आदतों से परिचित होकर उससे मनोविनोद करने लगे। इतने में
रेलगाडी अलवर रेलवे स्टेशन पर पहुंच गयी। चाय वाले की आवाज सुनकर बूढे के कान
खडे हो गये। उसने अपनी सीट से ही चाय वाले से चाय देने को कहा। चाय वाले ने बूढे
से तीन रुपये देने को कहा। बूढे ने दो रुपये बढा दिये।
तीन रुपये बाबा, तीन रुपये।
तीन ना हैं, दोई हैं!
एक यात्री ने चाय वाले से बूढे की सिफारिश कर दी। चाय वाला जल्दी में था। वह दो
रुपये लेकर और बूढे को चाय का गिलास पकडाकर चलता बना।
चाय पीने के बाद बूढे को बीडी पीने की तलब लगी। बूढे ने यात्रियों से बीडी मांगी
लेकिन उसकी आदतों को जानकर किसी ने भी उसे बीडी नहीं दी। वह थोडी देर मन मारकर
बैठा। लेकिन ऐसे वह कितनी देर बैठ सकता था।
उसकी प्यास की कोई सीमा न थी। ऐसा लगता था जैसे वह कोई प्यासा गहरा कुंआ हो।
उसने यात्रियों से फिर से पानी मांगना शुरू कर दिया। एक यात्री ने बूढे से कहा-
बाबा तुम पानी पीने के बाद थूकते बहुत हो, तुम्हें कौन पानी देगा?
नई थूकूंगा, पानी दो। बूढे ने अधिकारपूर्वक कहा।
लेकिन वहां बैठे किसी भी यात्री ने बूढे की बात पर विश्वास नहीं किया।
बूढा भी जिद्दी था, हार मानने वालों में से नहीं। जब उसे लगा कि यहां बैठे
यात्री उसको पानी नहीं देंगे तो वह आगे की सीटों पर बैठे यात्रियों से पानी
मांगने पहुंच गया। बूढे की हरकतों से अन्जान एक यात्री ने तरस खाकर उसे पानी
पीने के लिए दिया।
बूढा पानी पीकर वापस आया तो अपनी सीट ही भूल गया। वह अगली सीट पर उसी स्थान पर
बैठे यात्री की सीट को अपनी सीट समझकर उठाने लगा। लेकिन यह यात्री अपनी सीट क्यों
छोडता? बूढा उससे सीट छोडने की जिद् करने लगा। दोनों के बीच बहस शुरू हो गयी।
उन यात्रियों का हंसते-हंसते बुरा हाल हो गया जो बूढे की भूल से परिचित थे।
अचानक बूढे की नजर अपनी खाली सीट पर पडी। माथे पर हाथ मारकर बूढा अपनी सीट पर आ
बैठा।
रेलगाडी अब रेवाडी से आगे निकल चुकी थी। सवेरा होने लगा। बूढा सारी रात का जगा
था, वह सीट पर बैठा-बैठा ऊंघने लगा। उसे झपकी लगती तो वह आसपास बैठे यात्रियों
पर गिरता।
यात्रियों ने उसे समझाया- बाबा नीचे बैठ जाओ, नहीं तो गिर जाओगे, चोट खा लोगे।
ना, बैठूंगा। ना गिरूंगा।
बूढे ने किसी की बात नहीं मानी। वह जिद्दी घोडे की तरह अडा रहा। यात्रियों ने
उससे भिडने के बजाय उसे झेलने में ही अपनी भलाई समझी।
रेलगाडी के पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन तक पहुंचने पर भोर हो चुकी थी। अनेक
यात्री डिब्बा खाली कर अपने गंतव्य की ओर बढ गये। गिने चुने यात्री ही डिब्बे
में शेष रह गये। बूढा आराम से सोना चाहता था। यात्रियों ने प्रयास करके उसे ऊपर
वाली खाली बर्थ पर लिटा दिया। लेकिन बूढा अधिक देर तक वहां न रुक सका। यात्रियों
के मना करने के बावजूद वह नीचे उतर आया। एक यात्री ने खिडकी के पास वाली सिंगल
सीट बूढे के लिए खाली कर दी।
लगभग चालीस मिनट बाद रेलगाडी धडधडाती हुयी दिल्ली से चली। बूढे को जोर सी नींद
लगी थी। उसे झपकी लगी। नींद में झटका खाकर वह नीचे गिरने ही वाला था कि पास बैठे
यात्री ने उसे संभाल लिया। उस यात्री ने कहा-
बाबा खिडकी से सटकर बैठो नहीं तो गिर जाओगे।
ना, नहीं गिरूंगा।
बूढा अपनी जिद् पर अडा रहा। उसे फिर झपकी लगी। रेलगाडी अपनी पूरी रफ्तार पर थी।
बूढे को झटका लगा। इससे पहले कोई बूढे को संभालता, वह धडाम से सिर के बल गिरा।
उसके माथे से खून रिसने लगा। यात्रियों ने दया दिखायी, जैसे तैसे सुलभ वस्तुओं
से उसकी पट्टी की।
यात्रियों ने बूढे को समझाते हुए कहा- बाबा अब आराम से नीचे ही बैठो। आपको गहरी
चोट लगी है। मेरठ आने वाला है वहां उतरकर डॉक्टर से पट्टी करा लेना।
बूढे ने उसकी बात सुनी अनसुनी कर दी। वह कुछ देर तक नीचे बैठा रहा। लेकिन जैसे
ही उसे कुछ राहत महसूस हुई वह फिर से सीट पर बैठ गया। यात्री हार गये लेकिन बूढे
ने अपनी जिद् न छोडी। एक यात्री की सहनशक्ति बूढे की जिद् देखकर जवाब दे गयी।
उसने बूढे से नाराज होते हुए पूछा- बाबा, तुम अपनी जिद् क्यों नहीं छोडते? सब
तुम्हारी मदद कर रहे हैं फिर भी तुम किसी का कहना नहीं मान रहे हो।
बूढे ने जो जवाब दिया उसे सुनकर सारे यात्री विस्मित रह गये। उनके पास एक दूसरे
की बगल झांकने के सिवाय कोई चारा नहीं था। बूढे ने कहा- बच्चा, मैंने अपनी औलाद
की ना सुनी। थारी क्या सुनूंगा? तभी तो घर छोडकर हरिद्वार जा रहा हूं। वहां तो
किसी की ना सुननी पडेगी।
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