पटना (भाषा) : आसमान छूने के लिए सिर्फ पंखों की ही
नहीं हौसले की भी दरकार होती है। यह बात साबित की है बिहार की उन 12 लड़कियों ने
जिन्हें बिहार की बेटियां बताते हुए यूनिसेफ ने इस वर्ष के अपने कैलेंडर में जगह दी
है।
कम उम्र में बड़ी जवाबदारियों का निर्वाह कर रही ये लड़कियां अल्पसंख्यक वर्ग,
अनुसूचित जाति और जनजातियों से संबद्घ हैं। इस वर्ष मार्च में बिहार सरकार ने किशोरी
महोत्सव आयोजित किया था जिसमें करीब 2500 लड़कियों ने भाग लिया था। इन्हीं में से
यूनिसेफ ने उन 12 लड़कियों को चुना, जिन्होंने अपने बुलंद हौसलों से जीवन की
कठिनाइयों को शिकस्त दी है।
मुजफ्फरपुर की 17 वर्षीय अंगूरी खातून के पिता को अपराधियों ने मार डाला। मां यह
सदमा बर्दाश्त नहीं कर सकी और मानसिक संतुलन खो बैठी। छोटे भाई बहनों की जिम्मेदारी
अंगूरी पर आ गई। नन्हीं अंगूरी ने हार नहीं मानी और शांतिपुर गांव के एक प्रशिक्षण
केंद्र जा कर सिलाई व स्क्रीन पेंटिंग का काम सीखा।
अंगूरी की नानी ने बच्चों को पालना शुरू किया, लेकिन उनकी आमदनी इतनी नहीं थी कि
अंगूरी की मां का इलाज भी कराया जा सके। अब अंगूरी अपने परिवार का भरणपोषण कर रही
है।