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मन में बसा गाँव
Arti Jha

.......................क्यों क्या पूछ रहे हैं साहब। रामनाथ आचार्य पिछले 30 वर्षों से मुंबई में रह रहे हैं। सायन जैसे उपनगर में तीन बेडरूम का, आधुनिक साज-सज्जा युक्त स्वयं का फ्लैट है, जहाँ सरस्वती और लक्ष्मी दोनों बरसों से प्रेमपूर्वक साथ रही हैं। इस सबने हमारी मम्मी को अहंकारी बना दिया है। उनका कहना है- गँवारों जैसे जीना भी कोई जीना है?

वैचारिक बुद्धिवादिता के दायरे में न आने वाले लोग उन्हें पसंद नहीं हैं। इसीलिए अभी तक दर्जनों लड़कियों की तस्वीरें और जनमपत्री लौटा चुकी हैं। किसी की फोटो पसंद नहीं आती, तो किसी की जनमपत्री नहीं मिलती और जहाँ दोनों मिल जाते, वहाँ लड़की एज्युकेशन में मार खा जाती। मम्मी के विचारों में जहाँ तक हो, लड़की डॉक्टर हो या कम से कम साइंस पोस्ट ग्रेज्युएट हो।

हमारी मम्मी का अटल विश्वास है, कि कला की पढ़ाई अर्थात बीए, एमए सिर्फ वे ही लड़कियाँ करती हैं जिनके नंबर कम होते हैं। जिन्हें साइंस में भर्ती नहीं मिलती। क्योंकि उनमें कम अकल होती है। अब इस दायरे में चारुलता कहीं से भी नहीं आती। इसलिए भैया की दीवानगी परवान चढ़ने पर मुझे शक हो रहा था।

भैया भी धुन के पक्के निकले। मम्मी को उनकी केमेस्ट्री की भाषा में ही पाठ पढ़ाया- मम्मी, आपकी केमेस्ट्री में पानी का फार्मूला है एचटूओ, लेकिन प्यास का कोई फार्मूला नहीं होता क्योंकि प्यास अनुभूति है। आप मेरे लिए छप्पन भोग बना सकती हैं, लेकिन मेरीभूख मुझे ही लगनी चाहिए। क्योंकि वह अनुभूति है। पापा मुझे यूफोम की गद्दी वाला बिस्तर दे सकते हैं, लेकिन नींद नहीं दे सकते। नींद तो मेरी निजी है, वह मुझे ही आनी चाहिए। ठीक उसी तरह विवाह मुझे करना है इसलिए मुझे लगना चाहिए, मैं किससे विवाह करूँ?

मम्मी क्या समझी और कितना समझी, वही जाने। लेकिन चारुलता के पापा से मिलने गाँव जाने के लिए राजी हो गईं। शादी में वह उसकी मम्मी के साथ आई थी। शादी के दूसरे ही दिन हम चारुलता के गाँव के लिए रवाना हो गए।

छब्बीस साल की उम्र में पहली बार गाँव देखा। आश्चर्य हो रहा था। क्योंकि यह गाँव सिनेमा में देखे गाँव के सेट से और पुस्तकों में पढ़े कागज के गाँव से बिलकुल अलग था।

पहुँचने के 15-20 मिनट बाद ही चारुलता ने हमारे सामने लस्सी के ग्लास रख दिए। ऐसी स्वादिष्ट लस्सी कभी नहीं चखी थी। पापा बाहर बरामदे में बैठे चारुलता के पिताजी से बातें कर रहे थे। चारुलता के पिताजी बहुत विनम्रता से कह रहे थे, साहब, आप पढ़े-लिखे बड़े लोग हैं। हमारी और हमारी बेटी की उमर गाँव में गुजरी है। वह कैसे रह पाएगी? फिर बात सिर्फ इस देश के बड़े शहर की नहीं है, विदेश की है। मेरी बेटी परेशान हो जाएगी। जहाँ तक शादी का प्रश्न है, भगवान का दिया सब कुछ है। आप जैसी चाहें, वैसी व्यवस्था हो जाएगी, लेकिन एक ही बात मन में खा रही है। मेरी बेटी विदेशी जीवन को कैसे अपना सकेगी?

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