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शहद के एक
बूंद (लघु कथा)
श्री:जीतमोहन झा (जीतू
), mrjitmohan@gmail.com
मिथिलालाइव
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कुरु क्षेत्र के भीषण रक्तपात के बाद, अपन
सब पुत्र गवे चुकल शोक सs संतृप्त धृतराष्ट्र के दुःख विदुर के समक्ष
अश्रुधारा के रूप मs बैह लिकललैन ! तखन ओ सेविका पुत्र (विदुर) हुनका
समक्ष वर्तमान स्थिति के अनुकूल एक उपदेशात्मक निति - कथा के वर्णन
केलखिन !
विदुर कहलाखिन "आई एक ब्राह्मण के कथा अपने कs बताबेत छलो ! जे जंगली पशु
सs भरल जंगल म पथ - भ्रमित भो गेलखिंन रहा ! शेर आर चिता, हाथी आर भालू
के चीख, चिंघाड़, आर गर्जन एहेंन दृश्य जे म्रत्यु के देवता, यमो के मन
मs सिहरन पैदा के देतियेंन ! ब्रह्मणों कs ओ वातावरण डरे देलकैन रहा !
हुनकर पुरा शरीर भय सs कापैत रहैंन ! हुनकर मस्तिष्क आशंका सs भरल रहैंन
आर हुनकर भयभीत मन कुनू देवता कs व्याकुल भए तलाशैत रहैंन जे हुनकर प्राण
कs भयावह वनचर सs बचे सकतियेंन ! लेकिन ओई बर्बर जानवर के गर्जना सs पुरा
जंगल प्रतिध्वनित भो कs हुनकर मोजुदगी के आभास करबैत रहैंन !ब्राह्मण कs
एहेंन प्रतीत होई छ्लेंन की जते-जते ओ जैत छथिन जानवर के गर्जना हुनकर
प्रतिछाया बैन कए हुनकर पीछा करैत छ्लेंन ! अचानक हुनका लागलैन की ओ
भयावह जंगल एक धना जाल बूंइन कs हुनका आर डरे रहलैन य ! जंगल के गहनता एक
डरावनी स्त्री के रूप धैर, अपन दुनु हाथ फैले कs हुनका अपना मs विलीन करै
के निमंत्रण दे रहलैन य !जंगल के बिच मs एक कुआ रहैंन जे घास आर
बड़का-बड़का लत्ती सs ढकल रहै ! ओ ओही कुआ मs गिर गेलखिंन आर लती के सहारा
कुनू पाकल आम के तरह उलेझ कs सिर के बल उल्टा लटेक गेलखिंन ! हुनका लेल
डर के बादल गहरेल जैत रहैंन ! कुआ के तल म ओ एक राक्षसी सांप देखलैथ, कुआ
के मुंडेर पर एक बड़का हाथी जकर छः मुह आर बारह पैर रहैंन , ओ मंडरबैत रहे
! आर लत्ती के बिच मs बनल मधुमक्खी के छत्ता के चारो तरफ विशालकाय
मधुमक्खी ओकर अन्दर बाहर भिनभिनाबैत रहै ! मधुमक्खी के छत्ता सs टपकै बला
शहद के किछ बूंद लटकल ब्राह्मण के मुह पर गिरलैन ! ओई लटकल परिस्थितियों
म ओ ब्राह्मण शहद के ओ बूंद कs नै छोरलाखिंन ! जतेक बूंद गिरैत रहेँन
हुनका ओतेक संतोष प्राप्त होइत रहैंन ! मुदा हुनकर इच्छा शांत नै होइत
रहैंन ! ओ आर जीवित रहै लय चाहेत रहथिन ! जखन ओ शहद के मज़ा लैत रहैथ तखने
ओ देखलखींन की जै लत्ती पर ओ लटकल रहथिन ओई लत्ती कs किछ सफेद आर कारी
मूषक (चूहा) अपन धार दार दांत स कैट रहलैन या ! हुनकर भय आर बैढ़ गेलैन !
ओ भय सs चारो तरफ घिर गेलैथ, कखनो हुनका मांसाहारी जानवर के भय, त कखनो
डरावनी स्त्री, राक्षसी सांप त कखनो ओई लत्ती के भय हुनका होइत रहेँन जकरा
मूषक (चूहा) अपन दांत सए कुतरैत रहे ! भय के ओई बहाव मs ओ सिर के बल लटकल
छैथ ! अपन आशा के साथ, शहद के रसास्वाद के त्रिव आकांक्षा लै कs ओई जंगल
म हुनका जीवित रहै के आर प्रबल इच्छा रहैंन !
विदुर धृतराष्ट्र सs कहैत छथिन " इ जंगल एक नश्वर संसार अछि; अई संसार के
भौतिकता एक कुआ आर अंधकारमए कुआ के चारो तरफ के स्थान कुनू व्यक्ति विशेष
के जीवन चक्र कs दर्शाबैत अछि ! जंगली पशु रोग के प्रतीक अछि त डरावनी
स्त्री नश्वरता के धातक ! कुआ के नीचा बैठल विशालकाय सांप ओ काल अछि, जे
समय कs लिले लए तात्पर्य अछि ! एक वास्तविक आर संदेहरहित विनाशक के तरह !
लत्ती के मोह - पाश मs ब्राह्मण लटकल छैथ जे स्वरक्षित जीवन के मूल
प्रवृति छैथ जकरा सs कुनू जिव अछूता नै अछि ! कुआ के मुंडेर पर छः मुखी
हाथी के प्रतीक इ अछि, छः मुख अर्थात छः ऋतू आर बारह पैर मतलब साल के
बारह महीना ! लत्ती क कुतरे बला चूहा ओ दिन रैत अछि, जे मनुष्य के आयु कs
अपन पैने दाँत सs कुतेर-कुतेर कs कम के रहल अछि ! अगर मधुमक्खी हमर सबहक
इच्छा अछि तs शहद के एक बूंद ओ तृप्ति जे इच्छा म निहित अछि ! हम सब
मनुष्य इच्छा के अथाह समुद्र मs शहद रूपी काम-रस के भोग करैत डूब - उतैर
रहलो य !
अई तरह सs विद्वान लोग जीवन चक्र के व्याख्या केना छैथ, आर ओकरा सs मुक्ति
के उपाए सs अवगत करेना छैथ !
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