मिथिलालाइव
साहित्य
 
MithilaLive >Sahitya >>
अतुल्य-प्रकाश उर्फ बब्लू ...... 

दुनू लोकनि एके टेबुल पर बैसल छलाह मुदा बात किछु नहि भेलन्हि। बब्लू एहि दुआरे किछ नहि बजलाह जे हुनका एखनो नींद लागल छलन्हि आ हुनकर कनियाँ एहि दुआरे किछु नहि बजलीह जे हुनका एत्तेक बात कहैक छलन्हि जे फुराइते नहि छलन्हि जे कोन बात करब। खैर घड़ी में आठ बाजि चुकल छल। आ हुनकर कनियाँ बरसातिक दिन में अपने पति के बाय-बाय कहि ऑफिस जा चुकल छलीह। बाहर सँ ऑफिसक काजक तर बैसल आ भीतर सँ बरसातिक बोझ तर दबल। आ ताहु में हुनकर ससुरक गप्प "जीवन, परिवार, खुशहाली, बरसाति" बेर-बेर आबि हुनकर तंद्रा के भँग क' दैत छलन्हि।

जहिना हुनकर कनियाँ ऑफिस लेल गेल्थीन्ह बब्लू फेर स’ बिछाउन में पसरि गेलाह, एहि बात सँ निफिकिर जे सूर्यक रौशनी घर में दूधिया मरकरी कें हराबैक लेल ताल ठोकि रहल छल। बाथरूम'क नल सँ प्रत्येक दस सेकेन्ड पर चुबय बला पानि-बुनक टप-टप'क आवाजो हुनका विचलित नहि करैत छलनहि। आ बाहर तरकारी बेचय वाला वाला आ कबाड़ीवाला'क आवाज सेहो। हुनकर नींद तखने टुटलन्हि जखन घरक काल-बेल बजल।

ओ आँखि मीड़ैत उठलाह आ केवाड़ी खोलि देलथीन्ह। दिवाल घड़ी में दिनक एग्यारह बजैत छल। मुदा जे सामने में देखलथिन्ह ओहि सँ हुनकर नींद एक्के बेर में टुटि गेलन्हि। हुनकर कनियाँ हँसैत ठाढ़ छलीह। मोन में एक साथ एक हजार प्रश्न उठलन्हि। कम सँ कम ओ अपेक्षा करैत छलाह जे हुनकर कनियाँ ई पुछथीन्ह, "अभी तक सो रहे हो?" मुदा बाजि किछु नहि सकलाह। हुनकर कनिएँ अन्दर आबि हुनका एकटा कागज थम्हा देलथिन्ह। ओ कागज नहि हुनकर रेजिगनेशन लेटरक एकटा कॉपी छल। हुनकर कनियाँ कहलथिन्ह, "मैंने छुट्टी लेने का हर सम्भव प्रयास किया लेकिन छुट्टी नहीं मिला" इसीलिए मैंने रीजाइन कर दिया।

आब बारी बब्लू'क छल ओ कहय लगलाह, " हम अहाँ के मना केने रही ने, मुदा बरिसाइत'क पूजा लेल रेजीनेशन द' देलहुँ. हम अहाँ के कहने छलहुँ ने "जीवन बहुत पैघ छैक आ आय सँ पचास साल बाद कतेक लोक एहि परम्परा के आगू बढ़ेताह से पता नहि। पचास साल बाद किओ बरसाति मनेबो करताह की नहि से पता नहि। ते अपना लोकनि किएक एहि में फँसि अपन जीवन खराब करब। यदि अहाँ के छुट्टी नहि भेटैत अछि ते जाऊ अहाँ काल्हि आफिस जाऊ"।

हुनकर कनियाँ सँ आब रहल नहि गेलन्हि, ओ बब्लू'क छाती में मुँह नुकाय जोर जोर सँ कानय लागलीह। बिल्कुल बच्चा'क तरहें। हुनकर नोर में कोनो वैमनस्यता नहि छल ओ सुख'क नोर छल जकरा तर्क द्वारा कखनो साबित नहि कयल जा सकैत छल। कहय लगलीह, " ई हमर दाम्पत्य जीवनक शुरुआत थीक, आ ई पूजा ते जीवन में एक्के बेर होइत छैक, आ ओहो दम्पत्य जीवनक आ ओकर बाद अपन खुशहाली लेल। एहेन एहेन नौकरी ते जीवन में कतेको आयत... मुदा बरिसाति ते एक्के बेर ने। हमरा अन्दर में एत्तेक क्षमता नहि अछि जे सामाजिक ई मान्यता के पार क' जायब..."

फेर ओ ओएह नोर सँ कानय लागलथिन्ह बिल्कुल बच्चा'क तरहें। अतुल्य-प्रकाश के अपन कनियाँ ओहि नोर में बब्लू'क सहजता आ निश्चछलता भेटलन्हि।

एक बेर फेर एकटा स्त्री एकटा पुरुष केँ मानवता'क यूद्ध मे हरा देने छलीह.

 

Finish



 सौजन्य: www.vidyapati.org
और भी
 
 

Feed Back  -   Refer To Friend - Terms Of Use- Privacy Policy About Us  -  Contact Us  - Careers -Advertise With Us
© 2007 Adarsh Internet Pvt. Ltd. Benipatti Madhubani All Right Reserved info@mithilalive.com