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"हम बंगलौर
से राजीव रंजन लाल बाजि रहल छी, हमरा अहाँक माँ से बात करबा के छल।"
"माँ स'", ओ आश्च्रर्य होयत कहली।
"हाँ, माँ जी स'" – हमर सभटा गणना त' माँ से बातक शुरुआत करय के छलैक, से
अपने मोने ई बात मुँह पर आबि गेलय।
"मम्मी, ये तुमसे बात करना चाहतें हैं" – ओ हिन्दी में बाजली माँ स'।
"हम क्या बात करेंगे, फोन तुमसे बात करने के लिए किए हैं" – हमरा पाछाँ
से माँ के आवाज स्पष्ट सुनायी पड़ल।
"लो ना, तुम बात कर के देखो, शायद कुछ पूछना हो तुमसे...तुम फोन लो" – ई
कहैत ओ फोन माँ के द' देने छलखिन।
"गोर लागय छियेन्ह माँ जी" – हमरा मुँह से बहरायल। माँ जी से बात करय में
कनेक बेसी सहज छलहुँ आ अपन तेज होयत धड़कन के कनेक थाम्ह देलिअए।
"आयुष्मान होउ, चिरँजीवी होउ, दीर्घायु होउ, सदा सुखी रहु बेटा...की
हाल-चाल...कहु ना की कहबा के छल?" – एक्के ठाम ओ एते बात कहि देलैथ।
आब हमर लाज
कने कने विला गेल छल आ कनेक दृढ़ता आबि गेल छलय य' बात करय में, से हम
पुछलिएन "हम हुनका से गप्प क' सकैत छी"।
पहिने एकटा खामोशी, फेर ओ पुछली – "अहाँ अपन पापा से पुछलिएन एहि विषय
में...ओ केना की सोचैत छथि। हमरा कोनो आपत्ति नहि बेटा, लेकिन अपन सभक
समाज त' अहाँके बुझले अछि...नव कथा आ कांच माटिक बरतन एक्के जकाँ, से अपन
पापा-मम्मी से सलाह क' लियौक। बाद-बाँकी त' बेटा एहि दिन ल' हम कते कबुला
गछने छी जे अपन धी जमाय के खुशी खुशी संग रहैत देखी। हमर त' सभ मनोकामना
पूर्ण होमय जा रहल अछि।"
माँ जी के चिंता स्वाभाविक छल आ हमरो हुनक बात से नीक अनुमान भेल अपन
संस्कृति आ संस्कार के। पापा फेर से बीच में आबि गेल छलैथ। पापा से अनुमति
भेटनाय त' निश्चिते छल मुदा हमरा अपन मुँह से अनुमति माँगनाय असंभव काज
बुझायल। से हम चटे माँ जी के कहलिएन -
"हम पपे से नम्बर लेने रहिएक, मुदा मम्मी से एहि विषय में बात भेल, जे
हमरा हुनका से गप्प करय के अछि। मम्मी ई बात पापा के कहि देने हेतैक अखन
धरि।"
हुनक माँ निश्चिंत होयत बाजली – "हम अहाँ सभ के बहुत समय लेलौं, अहाँ सभ
बात करु।" ई कहैत ओ ओतय से चलि गेली आ फोन हुनक हाथ में छलैन्ह आब।
हम – "एकटा अनजान रिश्ता से शुरु क' रहल छी से हमर पहिल नमस्कार स्वीकार
करू, ई नमस्कार शायद आखिरी हेतैक अपना दुनु के बीच।"
हुनका किछु नहि फुरेलनि जे की जवाब देती, हुनक स्वप्नो में नहि छलैन्ह जे
गप्पक शुरुआत एना हेतैक। हुनका धारणा छलैन्ह जे हम बंगलौर में रहय बला
हाय-हेल्लो से शुरूआत करबय, से नमस्कार के जवाब में ओ गुम्म छलैथ।
हम – "हमरा बुझल नहि जे हम अहाँ से कोना बात करी वा एकरा कोना आगाँ बढ़ाबी,
लेकिन हमरा ई पुछबा के छल जे अहाँ से हम मैथिली में बात करी की हिन्दी
में।"
हुनका ई भनक छलैन्ह जे हमरा मैथिली नीक लागैत छैक से वो कहली
"आय धरि मैथिली बेसी बाजय के मौका त' नहि भेटल, से मैथिली ओते नीक नहि,
तखन हम कोशिश करय लेल चाहैत छी...जौं गलत बाजी त' अहाँ के सही करय पड़त।"
ई पहिल स्पष्ट वाक्य छल जे हमर कान में गेल आ हम मुग्ध भ' गेलौं। एहि
वाक्य में कतेको भाव छिपल छल हमरा लेखे...श्रद्धा, विश्वास, समर्पण,
प्रयास, संस्कार, लज्जा....सभ किछु त' रहबे करय। ओतबे नीक मैथिली के
टहँकार जे हम वाक्य खत्म होयत कहलिएन-
"अहाँ के मैथिली मिथिला में रचल बसल संस्कार के परिचायक अछि, स्वाभाविक
अछि...हमर मैथिली त' टँगटूट्टा मैथिली छैक जे पढ़ि के सीखल गेल अछि। हमर
मैथिली में भाव नहि, शब्द मात्र अछि। अहाँ केर मैथिली सुनि के हमरा मोन
निचैन भ' गेल कि हम जौं अहाँ से मैथिली में बाजी त' हम धन्य होयब आ एहि
से अहाँ से हमर आग्रह रहत जे हम सब मैथिली में बाजी।" आगाँ ओही में
जोड़लिअए
"घर सँ बाहर त' मैथिली के साफे चलन नहि से जौं हम अहाँ से मैथिली में नहि
बाजि सकलौं त' हमर मैथिलीक सेहनता हमरा अंदरे मरि जायत, ऊहो ई जानि के जे
हमर पत्नी के हमरा से बेसी नीक मैथिली आबैत छन्हि। तखनो अहाँक विचार, कोनो
निर्णय सोचि के लेब आ जाहि में खुशी होय से कहब। हमर शौक हमर जिद्द नहि
थीक।"
"जरुर बाजब, नहियो आयत त' हम सीख लेब। अहाँ के खुशी की हमर खुशी नहि?" ओ
मेंही आवाज में बजली। "मैथिली के हमरो सेहनता, मुदा हमरा ई हमेशा डर रहल
जे हम मैथिली बाजि सकब की नहि। आब हमरो बाजय लेल भेटत।"
पता नहि हमरा कोन धन भेट गेल। बिहाड़ि जकाँ मोन उधियाबय लागल। खुशी के
ठेकाना नहि छल। अखनो मिथिला जानकी आ भारती के जननी छैक? ई प्रश्नक उत्तर
हमरा अपन कनिया रूप में भेटत से हमरा कोनो अनुमान नहि छल। अंदर के खुशी
के दबाबैत हम बाजल -
"कोन तरह के बात करी से हमरा नहि बुझल, कहियो लड़की सभ से गप्प करय के मौका
नहि लागल से अहीं किछु कहु।"
ओ कहली – "हमरो ई पहिले बेर अछि से जेना अहाँ तेना हम। हम की कही?"
हमरा किछु नहि फुरायल, सोचलौं जे कोनो गंभीर बात नहि कयल जाय आ सिनेमा
में हुनक रूचि पुछलिएन। फेर बात आगाँ निकललय आ हमरा बेसी किछु फुरायल नहि
से अनाड़ी जकाँ कहलिअए जे "हम सब बाद में गप्प करब। आब राखय छी।"
जवाब में ओ चुप्प रहि गेलखिन आ हम फोन काटल। फोन त' राखि देलऔं, मुदा मोन
ओही भवसागर में भसियाएत छल। तुरंत मम्मी के फोन केलिअए ई सूचित करय के
लेल जेना हमरा कोनो पुरस्कार भेटि गेल होउ। आब बहाना के तलाश छल जे आगाँ
कोना बात करी। हुनका से एक बेर गप्प करय के बेगरता त' समाप्त भ' गेल छल
मुदा कान तरसि रहल छल हुनक बात सुनय के लेल। दोसर दिन अपन छोट बहिन-भाई
सभ के फोन क' कहलिअए जे भाभी से गप्प भेलौ तोहर सभक। जबरदस्ती ओकरा सभ के
उकसेलिए जे बात क' ले अपन भाभी से। एकटा प्रयोजन त' ई साबित करय के छल जे
हमरा जे सोन हाथ लागल से अनमोल छथि आ दोसर जे ओही बहाने हमरा हुनका से
फेर बात करय के मौका लागत जे कोना कि बात भेल। ओम्हर ओ दिन भरि इंतजार
में छलीह जे हम कखन हुनका फोन करबय। हमरा ऑफिस से अयला पर मौका लागल आ
हुनका फोन केलिएन। ओ पुछली "नाश्ता भेल?"
फोन करय के ताक में नाश्ता के सुध त' नहि छल मुदा हुनक जिज्ञासा मोन के
संतुष्टि प्रदान कएल जे हमरो लेल कियो थिकीह जिनका ई चिंता जे हम कोना जी
रहल छी। जिनका हमरा से मतलब। जिनका लेल हम प्रधान। हमर जवाब सेहो प्रश्न
छल – "अहाँ के किछु नाश्ता भेल?"
"ऊँहुँ" – हुनक जवाब छलैन्ह। "अहाँ ऑफिस से आयल छी, किछु जरूर से खा लिय',
भूख लागि गेल हएत।"
बातक क्रम जे शुरु भेल त' खतम लेबाक नामे नहि। हम हुनका "सोना" कहि
पुकारिए आ ओ हमरा सोना कहैथ। सोना के पर्याय जे हम अहाँक गहना आ अहाँ हमर
गहना। दु-तीन दिनक बाद सिद्धाँत भेल। सिद्धाँतक उपरांत ओ फोन कयलीह जे
हमर नाम हुनक नाम सँ जुड़ि गेल छैक आ आब हुनका हमर इंतजार जे हम कहिया
हुनका स' विवाह क' अपन जीवनसँगिनी बना रहल छी। अजीब प्रसन्नता मोन के
भेटल। मोन भेल जे चिल्ला क' आकाश स' कही जे हम आय बहुत खुश। हमरा छोट छोट
बात में हुनक ध्यान आबय लागल आ हम एकदम से हुनक पाश में जकड़ि गेलौं। भोर
उठिते हुनका फोन केनाय, ऑफिस से लंच टाइम में कॉल केनाय। सांझ में हुनकर
जिज्ञासा के फोन एनाय जे नाश्ता भेल की नहि। आब त' ई जीवनक्रम से जुड़ल
बात भ' गेल छैक। एक बेर हुनक मुँह से बहरेलनि "हमर सोना, हमरा से जँ एतय
गप्प करब त' अहाँ के अपन काज प्रभावित हैत आ अहाँ बाद में हमरा दोष देब
जे हम अहाँ के बरबाद क' देलौं।"
"अहाँक सोना त' आब बरबाद भ' गेल अछि। आबो एहि में कोनो शक की?" – हमर
जवाब छल।
"हमरा से बात नहि करू जाऊ, हम अपन सोना के बरबाद नहि करय चाहय छी।" – ओ
हँसैत जवाब देलीह।
"अहाँ के रहल भ' जायत अपन सोना से बात कयने बिना? हमरा त' अपन सोना से
विरह असह्य भ' जेतैक।" – हम कनमुँह जकाँ करैत जवाब देलिएक। फेर कहलिएक –
"जाऊ, जौं अहाँ के इएह मोन त' हम नहि करब बात अहाँ स'"।
"ठीके हमर सोना हमरा से बात नहि करत...?" – ओ बच्चा जकाँ कहलीह।
"हाँ, अब वियाहे दिन बात करब" – हम कनेक नखरा करैत कहलौं।
- "जौं हमर सोना के प्रण टूटि गेल त'?"
- "तखन अहाँ जे सजा दिअय हमरा मंजूर"
- "सोचि लियअ सोना, हम जे कहब से अहाँ के करय पड़त"
- "हम कहाँ भागि रहल छी"
हुनकर हँसी
अचानके बंद भ' गेलनि आ ओ कनेक गंभीर होयत कहलखिन – "सोना, हमरा एकटा वचन
दियअ जे अहाँक प्रेम हमरा प्रति सदिखन एहिना बनले रहत आ हरिमोहन झा लिखित
पाँच-पत्र जकाँ एकर ह्रास नहि होयत। हमर सोना हमरा वचन दियअ।"
"हम वचन देलौं" – हमहुँ गंभीर भ' गेल रहऔं। ओही गंभीरता के भंग करैत फेर
हम कहलिएक "जे अहाँ के नहि रहल गेल आ अहाँ फोन केलौं त'?"
"कहु की चाही, सोना सौंसे अहीं के अछि, अहाँ के किछु कहय पड़त। अहाँ आदेश
दियअ सोना हमर।" – हुनक स्वर में कतेक रस एक साथ मिश्रित छल से हम फरिछा
नहि सकलौं। हमर मुँह कनेक काल धरि चुप्प भ' गेल। एहन बहुतो बेर भेल छल जे
हुनक जवाब हमरा आश्चर्य में डालि देने छल। तंद्रा तोड़ैत हम कहलिएन –
"सोना, जौं पहिने अहाँ हमरा फोन कयलौं, त' अहाँ के रोजे हमरा याद दिलाब'
पड़त जे सोना हमरा से बात करू।"
"ठीक" – ओ तुरंत उत्तर देलखिन्ह।
केहुना हम मोन के मारल आ दु घंटा धरि बरदाश्त कयल। फेर हमरा नहि रहल गेल
आ बाजी हारैत हम हुनका फोन केलिएन। एक बेर, दु बेर...तेसर बेर माँ जी फोन
उठेलैथ। कहलथिन जे अहाँक सोना पता नहि कखन से कानि रहल छथिन्ह आ ओहि दुआरे
फोन नहि उठा रहल छलीह। फोन हाथ में लैत ओ बाजलीह – "सोना, हमरा से अपराध
भेल से माफ करू....हम कोन मुँहे अपन सोना के अपना से बात नहि करय लेल कहलौं
से नहि जानी। सोना हमरा माफ करू।"
कतय हम ई सोचैत रही जे बाजी हारि गेल छी आ ओ ई देखैत पुलकित भ' जेती। मगर
ई की, प्रेमक परिभाषा पहिल बेर बुझा पड़ल। सभटा पहेली सन, सभटा अद्भुत...
आब बेगरता अछि जे कते जल्दी वियाह होय आ हमर सोना हमरा लग सीता बनि के
आबैथ आ हमर घर अयोध्या बनि जाय।
राजीव रंजन लाल, बंगलौर
संपर्क - 09342574820, rajeevranjanlall[at]gmail.com
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Finish |
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