पटना। वे प्रेमी हैं, लेकिन अधीर और दीवाने
नहीं। सुशिक्षित होने के कारण इनकी नौ साल की लंबी प्रेमकथा में न
प्रेमिका को घर से भगा कर जबरन शादी करने की कोशिश हुई, न प्रेमी पर
अपहरण का झूठा मुकदमा हुआ। दोनों पटना विश्वविद्यालय के पोस्टग्रेजुएट
हैं, इसलिए भरोसा करते हैं कि जमाना लाठी का नहीं, ज्ञान से काम लेने का
है। प्रेमी ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और न्यापालिका ने इस प्रेमी
युगल को सामाजिक-पारिवारिक पूर्वाग्रह से मुक्ति दिलाकर उनके विधिसम्मत
विवाह का रास्ता साफ कर दिया। मंगलवार को अदालत ने इस मामले में अपने
फैसले में कहा कि जाति बंधन व दकियानूसी विचारों के कारण वयस्कों को शादी
करने से जबरन नहीं रोका जा सकता।
मुख्य न्यायाधीश (सीजे) राजेश बालिया एवं
न्यायाधीश बरिन घोष की खंडपीठ ने कहा कि वयस्क लड़के-लड़कियों को शादी का
कानूनी अधिकार है, इसलिए वे इस मामले में स्वतंत्रतापूर्वक निर्णय लेने
के हकदार हैं। अधिवक्ता अतुल चन्द्रा ने प्रेमी सुमन्त स्वरूपम की ओर से
बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर कर कोर्ट से कहा था कि याचिकाकर्ता प्रीति
झा से बेइंतहां प्यार करता है। इसी तरह प्रीति भी उससे प्यार करती है।
1999-2001 में जब ये दोनों पटना विश्वविद्यालय में भूगोल के छात्र थे, तभी
शादी करने की मंशा जाहिर कर दी थी। जब दोनों की स्नातकोत्तर की पढ़ाई
खत्म हो गई तो प्रीति महिला कालेज हास्टल में रहकर कम्प्यूटर में डिप्लोमा
करने लगी और सुमंत शिक्षक बन गया। दोनों के बीच प्रेम प्रसंग चलता रहा।
याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि जब प्रीति
राजीव नगर के रोड नम्बर 24 में अपने चाचा के यहां रहती थी तो उसके
अभिभावक ने उस पर पहरा लगा दिया। इससे वे चाहकर भी शादी नहीं कर सके।
आवेदक ने कहा कि इस तरह वयस्क लड़की की वैधानिक इच्छाओं का दमन नहीं किया
जा सकता। याचिकाकर्ता ने लड़की को कोर्ट में बुलाकर सच्चाई से वाकिफ होने
का अनुरोध किया। इस पर खंडपीठ ने प्रेमी-प्रेमिका को कोर्ट में बुलवाया।
प्रशासन की मदद से मुख्य न्यायाधीश के चैंबर में पहुंची प्रीति ने साफ-कहा
कि वह सुमन्त को चाहती है और उससे शादी करने की इच्छा है। सुनवाई के
दौरान सुमन्त के पिता भी कोर्ट पहुंचे जबकि लड़की की ओर से उसका भाई मौजूद
था। मुख्य न्यायाधीश ने बारी-बारी से सभी से पूछताछ की और लड़के-लड़की को
स्वतंत्रता प्रदान करते हुए शादी करने की इजाजत दे दी।