सस्ते
मजदूरों की लगती है मंडी!
शेष
नारायण सिंह , BBC Correspondent
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दिल्ली और
आसपास के नवविकसित शहरों में कई जगहों पर मजदूरों की मंडी लगती है।
आमतौर पर किसी ख़ास जगह पर सड़क के किनारे सुबह सवेरे मजदूरों का जमावड़ा
शुरू हो जाता है और जिस किसी को भी जरूरत होती है, वह यहाँ से उन्हें
ले जाता है।
दिल्ली शहर में ओखला, राजौरी गार्डन,
चिराग दिल्ली और कोटला मुबारकपुर में मजदूरों की मंडियाँ बहुत दिनों से
लगती आ रही हैं।
अब फरीदाबाद, गुड़गाँव, नोएडा और ग्रेटर
नोएडा में भी मजदूरों के बाजार लगने लगे हैं। आम बोलचाल की भाषा में इन
मंडियों को लेबर चौक कहते हैं। नोएडा का लेबर चौक दिल्ली के आसपास के
इलाकों में सबसे मशहूर लेबर चौक है।
नेशनल हाइवे 24 से सटे हुए इलाके खोड़ा
कालोनी के पास यह मंडी लगती है। यहाँ एक तिराहे पर सुबह छह बजे से ही
मज़दूरों का जमावड़ा शुरू हो जाता है।
शहरों के लेबर चौक :
इसमें आमतौर पर उत्तरप्रदेश और बिहार से
आए हुए नौजवान होते हैं। आर्थिक नीतियों के कारण ग्रामीण इलाकों से बड़ी
संख्या में लोग शहरों की तरफ भाग रहे हैं। शहरों में रोजगार के अवसर बढ़
रहे हैं, और गाँवों में काम घट रहा है।
खोड़ा के लेबर चौक पर जब मैं सुबह पहुँचा
तो वहाँ करीब पाँच हजार लोगों की भीड़ जमा थी। इनमें ज्यादातर नौजवान
थे, 15 से 25 साल की उम्र के।
भीड़ में एक कोने पर कुछ महिलाएँ भी खड़ी
थीं। जब फोटो खींचने की कोशिश की तो उन्होंने मना किया कि 'साहब
रिश्तेदारों को पता चल जाएगा तो बहुत बदनामी होगी।'
खोड़ा के लेबर चौक पर इकट्ठा होने वाले
मजदूर ज्यादातर बिल्डिंग बनाने का काम करने वाले ठेकेदारों के काम आते
हैं। लेकिन सफेदी कराने या अन्य किसी कार्यों के लिए भी लोगों को ले
जाया जाता है।
ठेकेदार का हिस्सा :
इस मंडी में कुछ ऐसे भी लोग हैं जो चालीस
वर्ष से अधिक उम्र के हैं। यहाँ आए जितने लोगों से भी बात हुई, कोई अपने
काम से खुश नहीं दिखा। सब मजबूरी में काम कर रहे हैं।
उत्तरप्रदेश के जौनपुर जिले के लगभग 20
वर्षीय सुरेश का कहना है कि महीने में लगभग बीस दिन काम मिलता है।
सुरेश सफेदी का काम करता है। इस काम की मजदूरी वैसे तो 250 रुपए
प्रतिदिन है लेकिन बीच में ठेकेदार 50 रुपए हड़प लेता है।
बिहार शरीफ से आया मुहम्मद जहीन अहमद मूल
रूप से जरी का काम करता है। कई महीने से जरी का काम नहीं मिला तो लेबर
चौक पर खड़ा हो गया।
जो मजदूर कुशल नहीं होते उन्हें वैसे तो
150 रुपए की मजदूरी मिलनी चाहिए, लेकिन आमतौर पर 120 ही मिलती है। बीच
में ठेकेदार का कट होता है।
भारी भीड़ :
नोएडा के सेक्टर 82 से आए नरेश चौहान को
तीन मजदूरों की जरूरत है, जो अपने बगीचे को मिट्टी डलवाकर समतल कराना
चाहते हैं। वे कल भी पुताई के लिए कारीगर और मजदूर यहाँ से ले गए थे,
वे संतुष्ट है। जैसे ही उनकी कार लेबर चौक पर रुकी, करीब 15-20 मजदूरों
ने घेर लिया। नरेश चौहान ने बताया कि कल जिन मजदूरों को ले गए थे, उनका
काम अच्छा था, इसलिए आज भी उन्हें ही ले जाना अच्छा है।
इस तिराहे पर तैनात उत्तरप्रदेश पुलिस के
सहायक सब इंस्पेक्टर लव किशन शर्मा ने बताया कि जब कोई गाड़ी, कार या
टेंपो मजदूरों के बारे में पूछताछ करने के लिए रुकता है, तो लोग दौड़कर
उसे घेर लेते हैं।
वे कहते हैं कि बाकी और कोई समस्या नहीं
होती। यहाँ मारपीट कभी नहीं हुई। कानून-व्यवस्था यहाँ की कोई समस्या नहीं
है। और इस तरह आबाद है दिल्ली के आसपास के इलाकों में मजदूरों की सबसे
बड़ी मंडी क्योंकि यहाँ बंदे सस्ते मिलते हैं।

प्रस्तुती अरुण
कुमार झा info@mithilalive.com
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