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 ...यहां सरपंच साहिबा करती हैं मजदूरी
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पटना : बिहार में 27 सालों में पहली बार ग्राम कचहरी के पंचों और सरपंचों के लिए हुए चुनाव के बाद भी हालात जस के तस हैं। यहां अब तक ग्राम कचहरियों को ऐक्टिव नहीं किया जा सका है। इस वजह से राजधानी पटना के ही एक प्रखंड के पंचायत की महिला सरपंच दूसरे के खेत में न्यूनतम मेहनताने पर मजदूरी करने को मजबूर है। हालांकि, कहने को वह सरपंच साहिबा हैं।

राज्य में महिलाओं को 50 फीसदी का आरक्षण देकर महिला सशक्तीकरण का ढिंढोरा पीटते हुए राज्यसरकार ने डेढ़ साल पहले ग्राम कचहरी का चुनाव कराया था। इसमें हजारों की संख्या में महिलाएं अपने संघर्ष के बल पर सरपंच और पंच चुनी गई थीं। ग्राम कचहरी के क्रियाशील नहीं होने के चलते नवनिर्वाचित महिला सरपंचों और पंचों के पास करने को कुछ भी नहीं है। वे नाम के लिए सरपंच साहिबा बनी हुई हैं।

बिहार सरकार ने ग्राम कचहरी को ऐक्टिव करने के लिए कई बार आश्वासन दिए। इसके लिए बुनियादी संरचना खड़ा करने और न्यायमित्रों की नियुक्ति की प्रक्रिया भी शुरू हुई। लेकिन तकनीकी अड़चनों और वित्तीय समस्याओं के चलते अब तक इस प्रक्रिया को अमली जामा नहीं पहनाया जा सका। पटना जिले के डभामा पंचायत की निर्वाचित सरपंच मुनारिका देवी ने बताया कि वह बड़ी मशक्कत के बाद सरपंच चुनी गईं। उन्होंने कहा कि मुझे गांव की न्यायपीठ ग्राम कचहरी में पूरे सम्मान के साथ बैठकर न्यायिक फैसला सुनाना चाहिए, लेकिन मैं अपने गांव के ही खेतों में न्यूनतम राशि पर मजदूरी के लिए मजबूर हूं।




 
 

प्रस्तुती अरुण कुमार झा info@mithilalive.com  मजॆदार चुटकुलॆ दुसरा पॆज

 

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