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रावण-राम और
रामसेतु
दशानन अचानक पुनः भारत आ पहुंचा।
मायानगरी मुम्बई में हवाई अड्डे पर उतरते ही उसे अपनी औकात समझ में आ गई। कुलीन
घरों के छोटे बच्चे जो हवाई यात्रा पर जाने वाले थे, उसके दस सिर देखकर हंसी का
पात्र विदूषक, जोकर मानकर उसे घेरकर खडे हो गये। कुछ टीवी चैनलों तक इस अजूबे
की खबरें पहुंच गई। उनके संवाददाता मयऔजार वहीं कूच कर गये। पत्रकारों ने रावण
को देखा तो उन्हें यह कुदरत का नया करिश्मा नजर आया। दस सिर वाला कोई सख्स वे
पहली बार देख रहे थे। इतिहास की जानकारी उनके लिए नगण्य थी। सो वे दशानन का
अतीत भी नहीं जानते थे। इन सबके प्रश्नों की बौछार और कैमरों-फ्लेश लाइटों की
चकाचौंध से हैरान-परेशान रावण भागने का रास्ता ढूंढ रहा था। अचानक उसे गरियाते
हुए एक पत्रकार ने प्रश्न दागा- वापस कैसे लौटे? रावण ने अपने दस में से एक
मुंह को खोलकर कहा-यहां रामसेतु का कोई लफडा है उसी पर आयोजित कार्यशाला से
विशेष अतिथि के रूप में आमंत्रित हूं।
पत्रकारों को मुद्दा मिल चुका था, रावण के मुख से निकला, जवाब ब्रेकिंग न्यूज
था और अब तक रावण, स्वयं एक केरेक्टर बन चुका था। खैर जैसे-तैसे दशानन जैसा अपने
समय का महाशक्तिशाली यहां से जान-बचाकर भाग निकला। चमचमाते अर्श और फर्श वाली
विशाल होटल में पहुंचकर उसने चैन की सांस ली। थका हुआ व्यक्ति भूखा हो जाता है,
वह जैसे ही होटल के केंटीन में पहुंचा, वहां के बैरे से खाने की दर पूछना उसे
भारी पड गया। वह बेहोश हो गया। कारण बेटर ने उसे खाने की हर दर बताई थी, दो सौ
रुपये पर हेड। शाम को ही कुछ चैनलों के संपादक जुगाड लगाकर रावण से संपर्क करने
में कामयाब हो गये। सबसे तेज चैनल को सफलता मिल गई। प्राइम टाइम न्यूज में टीवी
स्क्रीन पर रावण दसों सिर के साथ मौजूद था।
एंकर ने शुरुआत की-रावणजी बताइये, त्रेता युग से कलयुग तक के सफर में आप कैसा
बदलाव पाते हैं? रावण गंभीरता से बोला-कोई विशेष नहीं। त्रेता युग मैं खुद रावण
मौजूद था। आज कलयुग में मेरी जैसी प्रवृत्ति के लोग बडी संख्या में मौजूद हैं
यानि मेरा विस्तार हुआ है हों यह बात दीगर है कि आज राम जैसा चरित्र ढूंत्रढे
से नहीं मिलेगा। उन्हें तो आप लोगों ने मंदिरों और दिलों से निकालकर राजनीति के
अखाडे में उतार दिया है। माता सीता के बारे में...उनका नाम कम से कम इस युग में
लेकर उनका अपमान मत करो, रावण बात काटकर बीच में बोला, मैं यदा-कदा आपके टीवी
चैनलों के कार्यक्रम देख लेता हूं। रोना आता है राम के भारत में सास-बहुएं ऐसी
हो गई हैं? लेकिन आपने तो उनका हरण किया था? वह मेरी मुक्ति का मार्ग था, इसलिए
मुझे ऐसा करना पडा था। लेकिन आज क्या हो रहा है भारत में कितनी महिलाओं का
हरण-चीरहरण-लज्जाहरण हो रहा है कोई राम उन्हें बचाने आगे क्यों नहीं आ रहा। यानि
मेरे जीत आज जाकर हो गई है हर तरफ मेरा बोलवाला है।
भ्राता लक्ष्मण जैसा भाई कहीं नहीं मिलेगा। सम्राज्य के लिए भाई-भाई लड रहे हैं
मेरी वर्तमान भारत को देखकर पुरानी विचारधारा ही बदल गई है। भरत जैसा खडाऊराज
चलाने वाला भाई नहीं मिलेगा, हां आपके यहां एक महिला जरूर है जिसने सत्ता का
त्यागकर (अ) सरदार को गद्दी सौंप दी है।
एंकर ने पूछा-रामसेतु के बारे में आपके विचार? रावण तुनककर बोला-मुझे नहीं
मालूम था कि भारतीय इतने एहसान फरामोश हैं। अरे भाई जब मैं साक्षात, मय दसों
सिर आपके सामने मौजूद हूं तो राम भी तयशुदा रूप में होंगे और यदि रामसेतु नहीं
होता तो आज क्या लंका की सत्ता मेरे हाथों से जाती। अरे, मैं तो मर-मिटकर आज भी
भारत के कई लोगों के पेट भरने का काम कर रहा हूं। कैसे भई देखो, हर साल दशहरा
पर मेरे पुतले बडी संख्या में बनते हैं, उन्हें बनाने वालों, उनकी सामग्री
सप्लाई करने वालों, पटाखे वालों यहां तक कि रामलीलाओं में राम-सीता बने पात्रों
को भी मेरे कारण नकद नारायण मिलता है हुआ कि नहीं मैं इन सबका पालनहार।
लेकिन यहां की सरकार तो नहीं मानती कि राम-रावण कभी थे। रावण ठहाका लगाकर बोला,
यानि ऐसा है तो हिन्दुस्तान-लंका में मेरे वंशज कहां से आ गए? कौन से वशंज अब
वह सब मुझसे मत कहलवाओ। मैं महापंडित पराक्रमी, ज्ञानी-विज्ञानी राजा था, लेकिन
मुझमें अहंकार था। आज आप बताएं भारत-लंका में कितने लोग महापंडित, पराक्रमी
ज्ञानी विज्ञानी हैं। अंगूलियों पर गिनने लायक। लेकिन अहंकार कितनों में है हुए
न सभी मेरे वंशज।
एंकर ने टोकते हुए फुसपुसायी आवाज में कहा- यह कार्यक्रम सीधा प्रसारित हो रहा
है-इसलिए इसमें शब्दों का चयन संयमित होकर करें।
अच्छा यह बताइये, सीताहरण के पश्चात आपकी मनःस्थिति कैसी थी। शुरूआत में तो मैं
उत्साहित था। मैं राम से बदला लेना चाहता था। मैं आधुनिक भारत जैसा देश चलाने
का पक्षकार था, लेकिन राम वे तो मर्यादा पुरुषोत्तम थे, सात्विक थे, आदर्श राज
चलाने में भरोसा रखते थे। कुल मिलाकर तब की स्थिति में मैं आज का पाकिस्तान जैसा
शासन चाहता था। मगर यह सब तो इतिहास रामायण कहीं दर्ज नहीं है? कैसे होगा आम
राम रावण का अस्तित्व नहीं मानते तो आपकी रामायण मे कैसे इन चीजों का उल्लेख
होगा? लेकिन एक बात के लिए मैं आपको धन्यवाद दूंगा रावण बोला- मेरे वध के सदियों
बाद भी मुझे याद किया जाता है और इससे बडी बात क्या होगी कि चाहे हर साल मेरा
दहन आप करते हैं लेकिन साथ ही मेरा कद भी तो बढा ही रहे हैं।
अब एंकर ने उसके व्यक्तित्व पर लौटते हुए पूछा-इस विचित्र काया (10 सिरों) के
साथ कैसे सामंजस्य बैठाते हैं। रावण ने ठंडी सांस भरकर कहा भइया बडे दुर्दिन चल
रहे हैं। सत्ता हाथ से चली गईं लंका का पूरा सोना चला गया, खाने के लाले पडे
हैं। दस सिरों के साथ दस मुंह भी तो हैं सभी को पालना पडता है। नौकरी धंधा है
नहीं जैसे तैसे दिन काट रहा हूं।
एंकर ने रावण की ओर दयाभाव दिखाते हुए पैंतरा बदला हाल ही में हनुमान जी के
चरणचिन्ह लंका में मिले हैं। रावण ने आदरभाव दिखाते हुए कहा- अब उनसे पूछिये कि
राम-सीता का अस्तित्व था या नहीं वैसे में भारत की राजनैतिक संस्कृति के पचत्रडों
में नहीं पत्रडना चाहता।
अब तक रावण के साक्षात भारत में होने की खबर फैल चुकी थी सो उसके दर्शन के लिए
हुजूम उमड पडा। कुछ रामलीला संचालक उसे रामलीला में काम करने को बेताब दिखे इन
सबसे बढकर एक रामलीला समिति के संचालक ने तो बकायदा रावण को ऑफर दे डाला-रावण
दहन कार्यक्रम में मुख्य अतिथि का। बेचारा रावण! उसके पास अपने दस सिरों पर पैर
रखकर भागने के अलावा कोई चारा नहीं था।
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