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हम मजबुरी मॆं पढतॆ
हैं सरकारी महाविध्यालय में :-
राष्ट्रीय मूल्यांकन एवं प्रत्यायन परिषद
द्वारा प्रत्यायित देश भर की उच्च शिक्षा संस्थाओं की मूल्यांकन रिपोर्ट अब
इन्टरनेट पर उपलब्ध हैं। इनके अध्ययन से सहज ही देखा जा सकता है कि आज हमारे
विश्वविद्यालयों और कॉलेजों की वस्तुस्थिति क्या है। एक ओर अनेक उच्च स्तरीय या
कहिये कि विश्व स्तरीय शिक्षा संस्थाएं हमारे यहाँ हैं तो दूसरी ओर ढ़ेर सारी
दरिद्र शिक्षा संस्थाएं भी हैं। ए स्तर पर प्रत्यायित अधिकांश संस्थाएं निजी
क्षेत्र की अथवा सरकारी अनुदान प्राप्त निजी क्षेत्र की संस्थाएं हैं जबकि सी
स्तर पर प्रत्यायित संस्थाओं में सरकारी कॉलेजों की भरमार है।
हमें हैरानी तब अधिक हुई जब सी स्तर पर प्रत्यायित सरकारी कॉलेजों की सूची में
हमने उन सरकारी कॉलेजों के नाम भी पढ़े जो कभी अति-प्रतिष्ठित कॉलेजों के रूप
में सुख्यात थे। जिज्ञासा वश हमने उन कॉलेजों की मूल्यांकन रिपार्ट पढ़ी और हम
विषादग्रस्त हो गये। हमें लगा कि शायद उनके भव्य भूतकाल को देखकर ही उन्हें सी+
या सी++ स्तर पर प्रत्यायित किया गया है, अन्यथा उनमें से कुछेक तो प्रत्यायन
के योग्य भी नहीं प्रतीत होती हैं। इन रिपोर्टों को पढ़ने के बाद हमारा यह
स्पष्ट अभिमत है कि प्रतिष्ठित सरकारी कॉलेजों की यह दुर्दशा
अफसरशाही-लालफीताशाही जन्य सरकारी उपेक्षा, लापरवाही और गैरजिम्मेदारी का ही
परिणाम है।
सरकारी कॉलेज देश के सभी राज्यों में फैले हुए हैं और सभी कॉलेजों की लगभग एक
जैसी ही राम कहानी है। इसलिये हम एक प्रतिष्ठित कॉलेज की दुर्दशा के माध्यम से
इन सरकारी कॉलेजों की सर्व सामान्य दुर्दशा का थोड़ा सा चित्रण करना चाहेंगे।
गवर्नमेन्ट कॉलेज कोटा राजस्थान के हाड़ौती क्षेत्र का प्रतिष्ठित कॉलेज है।
मूलत: हरबर्ट हाईस्कूल के रूप में 1909 में स्थापित और बाद में 1945 से डिग्री
कॉलेज के रूप में मान्यता प्राप्त इस कालेज का परिसर 150 एकड़ क्षेत्र में फैला
हुआ है। इसका भवन राजमहल सा भव्य और विशाल है। इसके मध्य में ऊँचाई पर घंटाघर
भी शोभित है। पुस्तकालय भवन, वाचनालय भवन, प्रयोगशाला, कार्यशाला, स्टूडियो,
थियेटर, आचार्य निवास, अध्यापक आवास, होस्टल, अलग अलग खेलों के लिये अलग अलग
मैदान, कुल मिला कर मूलभूत ढ़ाँचे के लिये आवश्यक सब कुछ यहाँ उपलब्ध है। यहाँ
कला, विज्ञान और विधि संकाय में स्नातक, अनुस्नातक और शोध स्तर तक की शिक्षा की
व्यवस्था है। यहां कुल 17 विषयों में अनुस्नातक शिक्षा प्रदान की जाती है।
स्नातक स्तर पर 22 विभाग कार्यरत हैं। पुस्तकालय में 1,17,000 से अधिक पुस्तकें
उपलब्ध हैं। विद्यार्थियों की कुल संख्या 7000 के आसपास रहती है।
200 के करीब अध्यापक यहाँ नियुक्त हैं। अध्यापकों की योग्यता और उनका अनुभव औसत
से कहीं अधिक है। उनमें से अधिकांश के पास डॉक्टरेट की डिग्री है। कोई डि.लिट.
की डिग्री से भी विभूषित है। उनकी वैयक्तिक विद्याकीय सिद्धियां उत्तम प्रकार
की हैं। वे अपने लिये वह सब करते हैं जो पदोन्नति के लिये आवश्यक होता है। वे
यू.जी.सी. से शोध प्रकल्प स्वीकृत करवाना भी नहीं चूकते। परंतु उनका व्यवहार
सरकारी नौकरों की भाँति है। कभी भी उनका स्थानांतरण हो सकता है। अत: वे कॉलेज
से नहीं जुड़ते। उन्हें कॉलेज की संस्थाकीय सिद्धियों से कोई मतलब नहीं रहता है।
कॉलेज को यू.जी.सी. से सभी प्रकार की सहायता मिलती रही है जिसका पिछली पंच
वर्षीय योजना का योग लगभग 40,00,000 रूपया होता है। पुराने प्रतिष्ठित कॉलेज के
नाते इसे लाखों रूपयों का विशेष अनुदान भी मिला है। यू.जी.सी. ने इसे 1987 से
1997 के बीच ऑटोनॉमस कॉलेज के रूप में भी मान्यता प्रदान की थी।
परंतु इस सब के बावजूद कॉलेज को सी++ स्तर पर प्रत्यायित किया गया है।
मूल्यांकन रिपोर्ट में इसके अनेक कारण दिये गये हैं। सभी कारणों का उल्लेख यहां
न संभव है और ही आवश्यक। सारांश रूप में कहा जाये तो यह कॉलेज सरकारी
पदाधिकारियों और सरकारी कर्मचारियों की उपेक्षा, लापरवाही और गैरजिम्मेदारी का
शिकार हुआ है। उदाहरण के तौर पर, 7000 विद्यार्थियों के इस कॉलेज में पिछले दस
वर्ष से शारीरिक शिक्षण के व्याख्याता का पद रिक्त चला आ रहा है। व्याख्याताओं
के 25 से 40 पद खाली ही रहते हैं। प्रयोगशालाएं कबाड़ से भरी पड़ी हैं। वहाँ
प्रायोगिक कार्य या शोध कार्य कर पाना संभव ही नहीं है। परिसर में कूड़ा-करकट
यत्र तत्र सर्वत्र फैला रहता है। विद्यार्थीगण लघुशंका के लिये खुले आसमान में
जाने को विवश हैं। होस्टल अस्तबल से दिखायी देते हैं जहाँ गन्दगी और दुर्गंध का
साम्राज्य है। कालेज में शिक्षण कार्य मात्र 150 दिन चलता है। कॉलेज पत्रिका का
प्रकाशन वर्षों से बन्द है। पीयर टीम की रिपोर्ट के अनुसार यह प्रतिष्ठित कॉलेज
आज घोर उपेक्षा, लापरवाही और गैरजिम्मेदारी का शिकार है।
हम फिर से कहना चाहेंगे, यह मात्र कोटा कॉलेज का हाल नहीं है। ऐसे सभी सरकारी
कॉलेजों के मूल्यांकन रिपोर्टों में प्रकारांतर से लगभग ऐसी बातें कही गयी है।
ऐसे सरकारी कॉलेज दरिद्र नहीं हैं। और सरकारें भी दरिद्र नहीं है। कोटा कॉलेज
का प्रति विद्यार्थी प्रतिवर्ष खर्च कम नहीं है। यह 10775 रूपये के करीब बैठता
है। कॉलेज की समस्याएं या क्षतियाँ गंभीर प्रकार की नहीं हैं। ये असाध्य तो
बिलकुल ही नहीं हैं। इन्हें आसानी से दूर किया जा सकता है। बगैर ज्यादा धन खर्च
किये इन्हें दूर किया जा सकता है।
सवाल केवल अभिगम का है, अभिगम बदलने का है। यदि सरकारें चाहें तो कोटा कॉलेज
जैसे कॉलेज ए स्तर का प्रत्यायन प्राप्त कर सकते हैं। बी ++ स्तर का प्रत्यायन
प्राप्त करना तो इनके लिये बिलकुल ही मुश्किल नहीं होगा। राज्य सरकारें सरकारी
कॉलेजों को अफसरशाही और लालफीताशाही से मुक्त करें, सत्ता का सचमुच
विकेन्द्रीकरण करें, सरकारी कॉलेजों के आचार्यों का वास्तविक सशक्तिकरण करें,
और अध्यापकों को कॉलेज के प्रति अधिक उत्तरदायी बनायें, तो बहुत कुछ सिद्ध हो
सकता है। परंतु सवालों का सवाल यही है कि क्या सरकारें कभी अपना अभिगम बदल
पायेंगी? क्या वे अपना अभिगम बदलना चाहेंगी भी?
लॆखक नागॆन्द्र झा
khelubhai@mithilalive.com
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