मिथिलालाइव
साहित्य
 
 
MithilaLive > साहित्य‌ >>लॆख >>( काल - निर्णय )
कालिदास ( काल - निर्णय ) (प्रॊ शिव चन्द्र झा )

समकालीन या परवर्ती लेखकों ने भी कालिदास की तिथि- विषयक कोई निर्णायक उल्लेख नहीं दिया है। ऐसी परिस्थिति में एक, दो या तीन कालिदासों की प्रकल्पना या उनका पहली शती ई. पू. से लेकर छठी शती ई. तक के ७०० वर्षों के अंतराल में इतस्ततः प्रक्षेप इतिहासज्ञों के लिए स्वाभाविक ही है। सातवीं शताब्दी के पूर्वार्ध में लिखे एहोड़े के रविकीर्ति- रचित शिलालेख में और बाणभ की कादम्बरी में कालिदास का सर्वप्रथम उल्लेख है।

कालिदास के संबंध में कीथ का मत स्पष्ट है कि उनको गुप्तयुग के चरमोत्कर्ष के साथ रखा जाना चाहिए। कीथ के प्रमाण इस प्रकार हैं --

१. कालिदास ने ग्रीक शब्द जामित्र का प्रयोग किया है।

२. कालिदास की प्राकृत अश्वघोष और भास के पश्चात की है।

३. कालिदास का ब्राह्मण- संस्कृति का सम्पोषण, काव्योचित वातावरण का ऐश्वर्य, अश्वमेध यज्ञ का वर्णन, रघु की विजय आदि गुप्त- युग में ही संसाध्य हैं।

४. कुमारसंभव से कुमार गुप्त की और विक्रमोर्वशीय से विक्रमादित्य की समकालीनता अभिव्यक्त होती है।

५. ४७३ ई. की वत्सभ की कुमारगुप्त संबंधी प्रशस्ति में कालिदास के ॠतुसंहार और मेघदूत के श्लोकों की स्पष्ट छाप है।

कीथ उपर्युक्त प्रमाणों के बल पर कालिदास को चंद्रगुप्त द्वितीय के समकालीन ४०० ई. के लगभग रखते हैं।

कालिदास को प्रथम शती ई. पू. में रखने वाले विद्वानों ने महाकवि को एक प्राचीनतर विक्रमादित्य से संबंद्ध किया है। इस विक्रमादित्य का उल्लेख प्रथम शती ई. में लिखी हुई गाथासप्तशती में इस प्रकार मिलता है --
संवाहण- सुहरसतोस्सिएण दन्तेण तुहकरे लक्खं।
चलणेण विक्कमाइत्तचरिअं अणुसिखिअं तिस्सा।।

परवर्ती जैन साहित्य के अनुसार प्रथम शती ई. के पूर्व ही विक्रमादित्य नामक राजा हुआ, जिसने शकों को उज्जयिनी से भगाया। यह घटना महावीर- निर्वाण के ४७० वर्ष पश्चात् अर्थात् ७५ ई. पू. की उल्लिखित है।

कालिदास किन्हीं विक्रमादित्य की सभा के जाज्वल्यमान रत्न थे, यह लगभग निर्विवाद है, पर यह विक्रमादित्य कौन थे, इस पर पर्याप्त मतभेद है। मुख्यतः दो मत उल्लेख्य हैं। एक तो वह, जो इन्हें सन ५७ ई. पू. में विक्रम- संवत के प्रवर्तक शकारि विक्रमादित्य का सभाकवि बताता है और दूसरा वह, जो इन्हें चंद्रगुप्त विक्रमादित्य द्वितीय शासनकाल (३८० ई.-४१५ ई.) का सभाकवि मानता है। अधिकांश देशी- विदेशी विद्वानों का मत गुप्तकालीन विक्रमादित्य के पक्ष में है।

कालिदास ने कई ग्रंथों की रचना की उनमें महत्वपूर्ण ह ैं --

मालविकाग्निमित्र , कुमारसंस्भव , विक्रमोर्वशीय , मेघदूत , कुन्तलेश्वर दौत्य , शाकुन्तल, रघुवंश आदि

"ॠतुसंहार' से "रघुवंश' एवं "मेघदूत' तक के काव्यों एवं "मालविकाग्निमित्रम्' से लेकर "अभिज्ञानशाकुंतलम्' तक के नाटकों के अध्ययन से कालिदास की प्रतिभा एवं काव्यकौशल के क्रमिक विकास की रुपरेखा प्रस्तुत की जा सकती है।

कालांतर में जैसे- जैसे अन्य काव्य ओर नाटक विस्फुटित होते गये महाकवि का यश दिग्दिगन्तव्यापी हो गया। वे आलोचना का विषय न रहकर विस्मयकर श्रद्धा के अशेष पात्र हो गये।

कालिदास की रचनाओं में कौन पहले लिखी गई और कौन पीछे -- यह निर्णय केवल इसी आधार पर लेना संभव दिखाई देता है कि उनमें काव्यकला और शैली कहाँ तक विकसित है। इस दृष्टि से कालिदास का ॠतुसंहार सर्वप्रथम है, जिसमें कवि की शैली- कलिका विकासोन्मुखी है। मेघदूत अंतिम रचना माना जा सकता है। शेष रचनाओं में रघुवंश सभी दृष्टियों से कुमारसंभव की अपेक्षा प्रौढ़ लगता है। रघुवंश में कवि की कल्पना और पात्रोन्मीलन उच्चतर स्तर के प्रतीत होते हैं। कालिदास के रुपकों में अभिज्ञानशाकुन्तलम अन्य रुपकों की अपेक्षा अधिक ऊँचे काव्य स्तर पर रचा गया है। मालविकाग्निमित्र कालिदास की सर्वप्रथम रुपक- रचना है।



 
 

 आप अपनी राय भॆजॆं | संपादक कॊ पत्र लिखॆं | मित्र कॊ बतायॆं
© आर्दश इंटरनॆट प्रा. लि. मधुबनी 2007
 
 
Feed Back  -   Refer To Friend - Terms Of Use- Privacy Policy About Us  -  Contact Us  - Careers -Advertise With Us