मिथिलांचल में प्राप्त
पाण्डुलिपियाँ (पूनम मिश्र)
मिथिलांचल क्षेत्र के दो ग्राम-रामभद्रपुर एवं तरौनी-में
विद्यापति के प्रकाशित गीतों की दो पाण्डुलिपियाँ मिली है, यही कारण है कि इन
पाण्ड़ु़लिपियों को क्रमश: इन दो ग्रामों के नाम पर ही रामभद्रपुर परावली एवं
तरौनी पदावली जाना जाता है।
रामभद्रपुर पदावली: रामभद्रपुर पाण्डुलिपि तालपत्रों में, किन्तु खण्डित रुप
में है। सम्पति पत्र संख्या १० और पर संख्या २८ ही प्रारम्भ में है। अन्तिम
पत्र की संख्या १२१ है और अन्तिम पद की संख्या ४१८। इस समय इसके ३२ पत्र ही
हैं। ३२वें पत्र का आधा भाग ही है। अन्तिम पद खण्डित है, इसलिए निश्चित रुप में
नहीं कहा जा सकता कि उसके बाद भी पत्र होंगे। इसमें ९६ पद हैं, जिसमें प्रथम पद
का आदि तथा अन्तिम पद का अन्त खण्डित है। शिवानन्द ठाकुर ने सर्वप्रथम इसका
प्रकाशन १९३८ ई. में विद्यापति विशुद्ध पदावली के नाम से किया था, किन्तु ध्यान
देने योग्य बात यह है कि इसमें केवल ८६ पद हैं। मित्र मजुमदार ने भी केवल ९३ पदों
का उपयोग किया। इस पाण्डुलिपि के ६० पदों में विद्यापति की भणिता है, दो में 'अभियकर'
के नाम हैं। शेष ३१ पदों में ४, नेपालपोथी के नाम से जाना जाता है कि ये महाकवि
विद्यापति ठाकुर की रचना है और एक दूसरा नगेन्द्रनाथ गुप्त महोदय की
तालपत्र-पोथी में विद्यापति की भणिता से युक्त पाया जाता है। अन्य २६ पदों के
बारे कोई प्रमाण नहीं है कि वे महाकवि विद्यापति ठाकुर की रचना है।
तरौनी पदावली: मधुबनी जिला के तरौनी ग्राम में प्राप्त तरौनी पदावली का
सर्वप्रथम उपयोग नगेन्द्रनाथ गुप्त महोदय ने किया और उन्होने यह पाण्डुलिपि
कलकत्ता विश्वविद्यालय के पुस्तकालय को दे दी थी, किन्तु वहाँ से किसी प्रकार
खो गई। गुप्त महोदय के अनुसार "तरौनी-पदावली में प्राय: ३५० पद हैं जो सभी
विद्यापति के है।" पुन: उन्होने वसुमति-संस्करण की भूमिका में लिखा है कि, "तरौनी-पदावली
में विद्यापतिके जितने पद थे, सभी प्रकाशित कर दिये है।" गुप्त महोदय के
संस्करण में 'तालपत्र की पोथी से' नाम दिये जाने के कारण उनकी गणना करने पर कुल
पदों की संख्या २३९ ही आती है। किन्तु, अब मूल पाण्डुलिपि के अभाव में इस
विरोधाभास के समाधान के कोई रास्ता नहीं है। इन पदों का परिचय, मात्र गुप्त
महोदय की पदावली से ही हो सकता है। तरौनी-पोथी के विश्लेषण से पता चलता है कि
उसमें नगेन्द्रनाथ गुप्त द्वारा लिये गये २३९ पदों में १०३ में कवि के
पृष्ठपोषकों के नाम का उल्लेख है, १०१ की भणिता में विद्यापति का नाम है, किन्तु
किसी राजा का नाम नहीं है; ३१ पदों में किसी प्रकार की भणिता नहीं है, अतएव इनके
बारे में यह नि:संशय रुप में नहीं कहा जा सकता है कि ये विद्यापति ठाकुर की रचना
है।
रागतरंगिणी: उपरवर्णित तीन पाण्डुलिपियों के लिपिकार या संग्रहकर्ताओं की कोई
सूचना नहीं है, लेकिन महाकवि विद्यापति के लगभग २०० वर्ष बाद मिथिला में जन्म
लेने वाले लोचन ने रागतरंगिणी नामक अपूर्व ग्रन्थ का संकलन किया था। ये संगीत
के मर्मज्ञ थे। लय, ताल, छन्द, मात्रा आदि का विचार करते हुए लोचन ने उन पदों
को इक प्रकार श्रंखलाबद्ध कर अपने यथार्थ रुप में विद्यमान है। नगेन्द्रनाथ
गुप्त ने सर्वप्रथम इस संग्रह के गीतों का उपयोग अपने संकलन के लिये किया,
किन्तु उन्होने कुछ वैसे गीतों को भी बिपापतिकृत मान लिया, जिन्हें लोचन ने
अन्य कविकृत स्वीकार किया था। उदाहरण के लिए गुप्त महोदय के संस्करण का ४८४
संख्यक गीत रागतरंगिणी के पृष्ठ संख्या ६७ में 'जशोधर नवकविशेखर' के नाम से है:
भनई जसोधर नवकविशेखर पुहवी तेसर काँहाँ।
साह हुसेन भृंग सम नागर मालति सेनिक ताहाँ।।
गुप्त महोदय ने इन पंक्तियों का पाठ कुथ इस तरह कर दिया:
भनइ बिद्यापति नवकविशेखर पुहुवी दोसर कहाँ।
साह हुसेन भृंगसम नागर मालति सेनिक जहाँ।।
रागतरंगिणी के ३६ पदों में विद्यापति महाकवि का नाम है। तीन में विद्यापति की
भणिता नहीं है, किन्तु लोचन ने गीत के अन्त में "इतिविद्यापते:" लिख दिया है।
दो पदों में कण्ठहार भणिता है एवं उसके साथ शिवसिंह का उल्लेख है, अत: लगता है
कि ये पद महाकवि विद्यापति के ही होंगे।
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