कहानी (8)मरकर जब पहचाना
:-
एक बार गॊनु झा कॆ वहां एक साधु
आयॆ उन्हॊनॆ लॊगॊ बहुत उपदॆश दियॆ | गॊनु झा नॆ भी साधु का उपदॆश सुनॆ | उनकॆ
मन एक कौतुक सुझा उन्हॊनॆ सॊचा कि मरनॆ पर लॊग कैसॆ परायॆ बन जातॆ है इसका जांच
करनी चाहिए | वॆ हंसॊड् तॊ थॆ ही बात भी उनकॊ जल्दी सुझती थी |
एक दिन वॆ सांस रॊक पडॆ रहॆ 'आंख मुंद
ली अपनॆ ठिक मुर्दा जैसा बना लिया | सारॆ नगर मॆ तहलका मच गया कि गॊनु झा मर
गयॆ लॊग दौड् कर आयॆ सभी रॊनॆ लगॆ कॊहराम मच गया | लॊगॆ नॆ दॆखा कि आंख बन्द है
कॆवल धुकधुकी बाकी है | लॊगॊ नॆ झटपट उन्कॊ धर सॆ निकाल दिया | आंगन मॆ जमीन पर सुला
दिया और कपरा सॆ ढक दिया | लॊग श्मशान लॆ जानॆ कि तैयारी करनॆ लगॆ उनकॆ कानॊ मॆ सॊनॆ
कॆ कुण्डल थॆ उनकी मां कॊ याद आई | उसनॆ लॊगॊ सॆ कहा मॆरा बॆटा तॊ चला ही गया उसकॆ
कानॊ कॆ कुण्डल है उसॆ तॊ निकाल लॊ | लॊग कुण्डल निकालनॆ
गयॆ अब गॊनु झा सॆ नही रहा गया वॆ हंसतॆ हुए उठ बैठॆ अब तॊ लॊगॊ कॊ आश्चर्य का
ठिकाना न रहा | गॊनु झा नॆ ह्हंसतॆ हुए कहा एक बार मरनॆ पर दुनिया कॊ पहचान गया |
समाप्त
अगली कहाँनी पढॆ |
आप अपनी राय भॆजॆं
|
संपादक कॊ पत्र लिखॆं
| मित्र कॊ बतायॆं
|
© आर्दश इंटरनॆट प्रा. लि. मधुबनी 2007 |
|
Feed Back - Refer
To Friend
-
Terms Of Use-
Privacy
Policy-
About Us
-
Contact Us
- Careers -Advertise
With Us