मेरे
बाग में सिर्फ पतझड़ थे अब तक,
तु आयी
तो जैसे बहार आ गई है ।
ये
सावन का बारिश भी कहता है शायद,
ये
हरियाली कैसे यहॉं छा गई है ।।
मेरे
पास आओ, कर लो चंद बातें ।
तनहा
मैं बेबस, कितनी लम्बी है रातें ।।
जीवन
की पथरीली राहो पे हमकदम बन के चलना ।
जीना
तो है उसी का, जो जाने गिर के संभलना ।।
जी
चाहे तुझे पलकों पर मैं बिठाऊं ।
दे दो
अपने ऑसू, मैं तेरे हर गम उठाऊं ।।
भूल
जाना न मुझको, तुमपे मरता रहुंगा ।
इतनी
अच्छी हो दिल की, प्यार करता रहुंगा ।।
प्रवीण झा
pkjpanta@gmail.com
प्रवीण
झा,
स्वर्ग सॅ सुन्दर मिथिलाधाम
मैथिल भाई हमर प्रणाम
सत्तहवां सावन
कभी कभी
दिल मॆ बसा कर
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