वो खामोश निगाहें तेरी
आज भी मुझसे कुछकुछ कहती है ।
पर मैं अनजाना न समझ सका
तू कितना मुहब्बत करती है ।
दो कदम तुम तो बढी थी
मैं एक कदम भी बढ न सका ।
उस भूल की काली छाया अब तो
बदल चुकी जीवन की दशों दिशा ।
न जाने अब तुम कैसी हो
जैसी भी हो शायद अच्छी हो ।
पर मेरी नैया तो आज भी
इस सागर के तट पर ही खड़ा ।
अब साच रहा हूँ नैया से
न पार करूँ जीवन का सफर ।
बस तट पर बैठे बैठे ही
खुश हो लूँ कुछ औरों की तरह ।
जो करना था वो कर ना सका
अब पछताने से न होगा भला ।
बेहतर है शायद यादों को ही
मन ही में बसा रह लूँ तनहा ।
भोला मन था चंचल चितवन था
वह जीवन के बारे में न समझ सका ।
इसी भूल के कारण अब तो
अब काट रहा हूँ मैं तो सजा ।
स्वर्ग सॅ सुन्दर मिथिलाधाम
मैथिल भाई हमर प्रणाम
सत्तहवां सावन
कभी
कभी
दिल मॆ बसा कर
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