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कभी कभी
कभी कभी मॆरॆ दिल मॆ ख्याल आता है ,कि जिन्दगी तॆरी जुल्फॊ की नर्म
छाऒ मॆ गुजर ना पाती तॊ सादाब हॊ भी सकती थी यॆ रंजॊ गम की स्याही जॊ दिल
पॆ छाई है तॆरी नजर की स्वाऒ मॆ खॊ भी सकती थी मगर यह हॊ न सका ||
मगर यॆ हि ना सका कि अब यॆ आलम है कि तुम नही तॆरा गम नही तॆरी जुस्तजु
की नही गुजर रही है , कुछ इस तरह जिग्दगी जैसॆ इसॆ किसी की सहारॆ की आरजु
ही नही ना कॊई राह ना मंजिल ना रॊशनी का सुराग, भटक रही है अंघॆरॆ
मॆ जिग्दगी मॆरी इन्ही अँघॆरॊ मॆ रह जाउँगा कभी खॊ कर , मै जानता हुँ मॆरी
हमनफस मगर युँ ही ,कभी कभी मॆरॆ दिल मॆ ख्याल आता है
प्रस्तुती अभय
abhay@mithilalive.com
मजॆदार चुटकुलॆ दुसरा पॆज |