| यूँ ही कहीं
गूजर जाए न जिंदगी
- अरुण कुमार झा |
डर है कि यूँ ही कहीं गूजर
जाए न जिंदगी
बनने से पहले बिखर जाए न जिंदगी ।
आज अनसूलझी पहेली बनती जा रही है जिंदगी
गर हो सके तो आके सुलझा जाओ ये गुत्थी ।
परेशान से रहता है ये दिल
आखिर किस उलफ़त की चाहत में ।
औरों को बेवफा है समझता
खुद नासमझी की हालत में ।
मोलतोल करता है ये मन
खुद के प्यार को पाने में ।
फिर आखिर ये कैसे खुश हो
औरों का र्दद मिटाने में ।
औरों की निंदा करता है
स्वयं ही वैसा करता है ।
खुद नाकाम मुकामों पर वो
औरों को कोसा करता है ।
दुनिया की ही रीति रही है
जो न मिले उसे वो बुरा कहे ।
पाने पर मन रूकता ही नहीं
न पाने पर बेचैन रहे ।
फिर आखिर कब खुश हो मानव
क्या संभव है ऐसा होना ।
शायद नहीं कदापि नहीं
न हुआ कभी न होगा भी ।
प्रस्तुती अरुण कुमार झा
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मजॆदार चुटकुलॆ दुसरा पॆज
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