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मेरा मन तेरे मन से   -  अरुण कुमार झा

मेरा मन तेरे मन से
जी भर कर बातें करता है ।
तुमको ये मालूम है क्या
ये हर पल आहें भरता है ।

जरा कान लगालो धड़कन पर
मेरे दिल की धड़कन पाओगी ।
इसीलिए अकसर हम दो
हर मोड़ पे मिलते रहते हैं ।

अच्छा है तुमसे न मिल कर
दिल से दिल को मिलाया करते हैं।
ऐसे में न जाने कब
दिल सपनों में खो जाता है ।

हम दोनों से अच्छे ये मन हैं
ये बिना मिले मिल जाते हैं ।
न कोई बंधन न कोई सीमा
हर घड़ी ये बातें करते हैं ।

मिलता है तन तकरार होती है
तकरार से तिरस्कार होती है ।
इसीलिए तो मैंने सोचा
अच्छा है मन अच्छा जीवन ।

मन की खुशी के आगे
तन की खुशी बेकार है ।
तन तो सदा भूखा है रहता
मन तो सुखी संसार है ।

पर तन से सुख पाने वाले
यूँ न मिल जाया करते हैं ।
मिलने पर भी जान न पाते
ये मूरख संसार है ।


प्रस्तुति अरुण कुमार झा info@mithilalive.com 
अरुण झा की कविताँए

 

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