| बच्चे बढ़ रहे युवाओं की तरह
- अरुण कुमार झा |
बच्चे बढ़ रहे युवाओं की
तरह
युवा बूढ़े होते जाते हैं
बूढ़ों का तो क्या है कहना
बूढ़ापे में भी नए गुल खिलाते हैं ।
प्रेम टिका लैला मजनू< का
सीरी फरहाद बेमिसाल हुए
आज तो प्यार ठहरता ही नहीं जब
जो जितना बदले बेमिसाल बने ।
बूढापे में भी इश्क फ़रमाना
आज शान की बात बनी
जवानी जो आज एक से ब<धी
जवानी की ये तौहीन हुई ।
इस बदली परिभाषा को तो
आज सभी समझते हैं
इसीलिए तो शादी छोड़
किसी और के संग रह लेते हैं ।
नाम भी सुंदर काम भी सुंदर
नाम ही नहीं जो बदनाम भी हों
बस एक ही नाम तो काफी हैै
हम दोनों अव्छे दोस्त जो हैं ।
इस सुंदर नाम के पीछे
सारे रिश्ते छिप जाते हैं
खाते पीते ऐश हैं करते
फिर आजादी से रह लेते हैं ।
प्रस्तुती अरुण कुमार झा
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मजॆदार चुटकुलॆ दुसरा पॆज
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