मिथिलालाइव
साहित्य
 
MithilaLive >Sahitya >>कविता
 
कहबाक कला होइ छई   -   अविनाश

हिसाब-दौड़ी कहियो ने भेल
आंगुरक बीच मे भूर अछि
जे अरजल सभटा राइ-छित्ती भेल
छिपली मे बांचल कनखूर अछि

हमर गाम मे छल एकटा चौंसठ
कहैत छल,
अरजबाक कला होइ छई

जेना बिदापति मंच सं कहय छथिन कमलाकांत
कहबाक कला होइ छई

कलाजीवी झाजी आ कलाजीवी कर्णजी!
कलाजीवी हुकुमदेव आ कलाजीवी फातमी!

बाढ़ि मे दहा गेलनि जिनकर गाम
सुन्न छैन्ह जिनकर कपार
गुम्म छैन्ह मुह मे बकार

नचारी मे नहि ल' पओता आनंद

केओ उद्-घाटन बाती जरओता
केओ देता अध्यक्षीय भाखन
जाड़-बसात मे चमक चांदनी देखि
दुखित जन पीयर पुरान कागत पर लिखबे टा करत,
मुह के सी'बाक कला होइ छई

कतबो कहथु कमलाकांत
सुनबाक कला होइ छई
हल्ला-गुल्ला जुनि मचाउ बाउ
छी संस्कारी लोक
कहबाक कला होइ छई!

*********

प्रस्‍तुति-  अविनाश



 
 
 प्रस्‍तुति-http://mithila-mihir.blogspot.com/
More Poems From Pravin Jha
स्‍वर्ग सॅ सुन्‍दर मिथिलाधाम
मैथिल भाई हमर प्रणाम
आप आए, बहार आई
प्‍यार के फूल
धन्‍य-धन्‍य ओ मिथिला महान
मॉ मिथिले त कनिते रहती
  Advertisement

Feed Back  -   Refer To Friend - Terms Of Use- Privacy Policy About Us  -  Contact Us  - Careers -Advertise With Us
© 2007 Adarsh Internet Pvt. Ltd. Benipatti Madhubani All Right Reserved info@mithilalive.com