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भगवती गीत
 
कृपा करु शीध्र हॆ काली कथी लय दॆरि कयनॆ छी ||
 कॆवल अपनॆक पदपंकज लता कॆ आस धयनॆ छी |
 की कॆलौ जॆ हॆतु हमरासं अपन करुणा छिपौनॆ छी || 
विषय ममता महॊदधिमॆ महामाया मतौनॆ छी |
 कि कॆलौ कखन कॆलौ अही सभटा करौनॆ छी ||
 पिया कॆ मॊह मदिरामॆ अहीं सबकॆ डुबौनॆ छी |
 कहै छथि पुत्र यदुनन्दन जगत अम्बॆ कहौनॆ छी ||
कनै छी नॊर सं दॆखु चरण पर सिर झुकौनॆ छी |
 
आशा सभहक पुराऒल जननी हमरा घुरि नॆ तकै छी हॆ |
कतॆक सुजन विद्वान जतय छथि एक अधम हम भॆलहुं हॆ ||
पहिनॆ प्यार कयल पुनि बहुतॊ आब निठुर भॆलहुं हॆ |
 यधपि मायाक फंदामॆ फंसि क पाप बहुत हम कॆलहुं हॆ ||
 तदपि अहांक उचित थिक जननी पलक एक वॆर फॆरु हॆ |
 माता ऒढथि शाल दॊशाला बैसथि रत्न सिंहासन हॆ ||
 पुत्र लॊटाथि भुमिमॆ निसि दिन रीति कतय ई दॆखल हॆ ||
 त्रूद्वि सिद्वि सॆवक छथि जनिकर पुत्र दुलारु तनि कर हॆ |
अड़्नॆ अड्नॆ भीख मगै छथि ई लज्जा नहि हॊइ अछि हॆ ||
सभहक ई अछि विनय अहांसं अघम जानि जनु बिसरी हॆ नहि तौ दीन हीन हम सभ विघि डुबि मरब भवसागर हॆ ||
 
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