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लक्ष्मी पूजन : सौभाग्य और समृद्धि की अधिष्ठात्री महालक्ष्मी

पंडित प्रमोद तिवारी

माता महालक्ष्मी का स्वरूप-
माता महालक्ष्मी की आभा स्वर्ण के समान है। चार भुजाओं वाली महालक्ष्मी कमल पर विराजमान रहती हैं। दोनों आ॓र हाथी अपनी सूंड में स्वर्णकलश थामे अमृतजल से उनका अभिषेक कर रहे हैं। मां महालक्ष्मी रत्न जड़ित स्वर्ण कुंडल, करधनी, मुकुट एवं आभूषण पहने रहती हैं।
कब से शुरू हुआ महालक्ष्मी व्रत-
कालान्तर में जब राजा सुरथ एवं समाधि नाम का वैश्य अपने परिवार के लोगों द्वारा छले गए और जंगल में भटकने लगे तो उस समय राजा सुरथ ने अपने तन-मन को शुद्ध कर महामाया महालक्ष्मी का व्रत किया और हाथी पर विराजमान महालक्ष्मी स्वरूपा का ध्यान एवं आह्वाहन किया। तब से महालक्ष्मी का यह व्रत प्रारंभ हुआ जिसकी अतुलनीय मान्यता कलयुग में भी है। क्योंकि भिन्न-भिन्न देवता भिन्न-भिन्न युगों में फलदायी होते हैं, परंतु महालक्ष्मी चारो युगों में फलदायी होती हैं। श्रीकाल महाकाल संहिता में लिखा है -
‘अस्य मन्त्रस्य भृगुऋषि:। निवृच्छन्द:।
श्री लक्ष्मी देवता मम धनात्तये जये विनियोग:।
कब किया जाता है व्रत
अश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी के दिन माता लक्ष्मी के व्रत को बहुत ही श्रद्धा एवं भक्ति के साथ किया जाता है। पितृपक्ष के दौरान किसी भी देवी-देवता का अह्वाहन व पूजा-पाठ निषिद्ध होता है परंतु महालक्ष्मी का पावन व्रत पितृपक्ष के दौरान ही किया जाता है। इस व्रत को सधवा स्त्रियां, कुंवारी कन्याएं और पुरूष कर सकते हैं।
व्रत विधान -
महालक्ष्मी व्रत करने वाला व्रत से 15 दिन पूर्व अर्थात भाद्रमास शुक्ल पक्ष की अष्टमी से अपने तन-मन को किसी नदी, तालाब एवं घर में स्नान के दौरान दूब एवं कुश से शुचि कर शुद्ध करना प्रारंभ कर देते हैं। क्योंकि माता महालक्ष्मी को व्रत बहुत ही शुद्धता के साथ किया जाता है। इन 15 दिनों में बुरे विचार मन में न लाते हुए महालक्ष्मी के मंत्र ‘‘ॐ ऐ हृीं श्रीं क्लीं हूं सौ: जगत्प्रसूत्यै नम:’ का जप करना किया जाता है।
शुचि क्या होता है-
कहा जाता है कि शुचि जड़ है, संस्कार तना और उससे उत्पन्न होने वाले आचार विचार उसके फल है। जो व्यक्ति इसका समुचित पालन करता है उसका जीवन सफल होता है। यदि शुचि के शाब्दिक अर्थ को देखें तो इसका मतलब होता है तन एवं मन का शुद्धिकरण। वेदों के अनुसार शुचि के बारे कहा गया है-
ॐ अपवित्र: पवित्रों वा सर्वावस्थां गतोऽपिवा।
य: स्मरेत पुण्डरीकाक्ष स ब्राह्ाभ्यन्तर: शुचि:।।
साधना विधि- धर्म-दर्शन
यूं तो माता महालक्ष्मी की पूजा किसी नदी के तट पर संध्या काल में की जानी चाहिए लेकिन इसे घर पर भी किया जा सकता है। अष्टमी के दिन प्रात: उठकर उस दिन का शुचि अथवा 15 दिनों का शुचि एक साथ कर माता महालक्ष्मी के स्वरूप का ध्यान करना चाहिए। कुम्हार के यहां से मिट्टी का बना हाथी लाएं और पूरा दिन माता महालक्ष्मी का ध्यान करें। संध्याकाल में किसी एकान्त स्थान पर पूर्व दिशा की आ॓र मुख करके बैठें, बैठने के लिए लाल ऊन का आसन एवं कुश आसन का प्रयोग करें। अब आटे का चौक पूर कर उस पर बाजोट(पाटा) रखकर लाल कपड़ा बिछाएं एवं मिट्टी के हाथी को स्थापित करें व कलश स्थापित करे। महालक्ष्मी व्रत कथा सुने तथा अक्षत कुमकुम एवं पकवान से महालक्ष्मी का पूजन करें। अगले दिन किसी ब्राह्ाण कन्या को जो भी चढ़ावा चढ़ा हो वह दान में दे दें।
पितृपक्ष मे ही क्यों किया जाता है व्रत
माता महालक्ष्मी ही सृष्टि का आदि एवं अन्त है माता महालक्ष्मी के व्रत के साथ-साथ हम माँ भगवती को नौरात्रों के हेतु अपने घरों में आमंत्रित करते हैं।
मिट्टी के हाथी का पूजन क्यों-
माता महालक्ष्मी के तीन आसन कमल, उल्लू एवं हाथी है। हाथी पर सवार महालक्ष्मी शुद्ध एवं सात्विक कार्य करने वाले जनों के घर जा कर उनके प्रत्येक दुखों का नाश करती हैं। इस कारण हाथी पर विराजमान महालक्ष्मी का आह्वान होता है।
फल प्राप्ति- पूजन समाप्त होने के बाद माता महालक्ष्मी से दु:ख हर लेने की प्रार्थना करें। महालक्ष्मी सुख समृद्धि वैभव प्रदान करती हंै। माता रानी की कृपा से घर के प्रत्येक सदस्य का व्यवसाय स्थिर होता है। तथा कोई दु:ख कभी नहीं छू पाता है।

 

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