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नवरात्रों में शारदीय नवरात्रका स्थान श्रेष्ठतर है। नवरात्रमें श्रीदुर्गासप्तशतीका पाठ अमोघ फलदायीहै। यह निर्विवाद तथ्य है कि नवरात्रमें मंत्रों की सिद्धि शीघ्र होती है। दुर्गासप्तशतीके सारे श्लोक सिद्ध हैं।

इसके पाठकर्ताइसकी अमोघ शक्ति से परिचित हैं। इसी कारण बहुत सारे भक्त सदा इस साक्षात् देवीस्वरूपापुस्तक का पारायण करते हैं।

श्रीदुर्गासप्तशतीमें शारदीय नवरात्रको अधिकतम महत्व दिया गया है।

श्रीदुर्गासप्तशतीमार्कण्डेय पुराण का एक अंश है। शारदीय नवरात्रके समय जो विभिन्न झांकियां बनाई जाती हैं, उनका आधार श्रीदुर्गासप्तशतीमें वर्णित देवी के पराक्रम ही हैं। इस पुस्तक को तीन भागों में विभक्त किया गया है। प्रथम भाग है- प्रथम चरित्र, दूसरा है मध्यम चरित्र एवं तीसरा है उत्तम चरित्र। प्रथम चरित्र के तीसरे अध्याय में सिंहवाहिनी दुर्गा महिषासुर का वध करती हैं।

श्रीदुर्गासप्तशतीमें जिस तरह यह वध सम्पन्न होता है, झांकी भी उसी अनुकूल बनती है।

मध्यम चरित्र केवल एक अध्याय (चतुर्थ) का है। इसमें महिषासुर के वध को सम्पन्न करने के लिए सभी देवता देवी की स्तुति करते हैं। इन देवताओं का नेतृत्व करते हैं इन्द्र (शक्र),इसीलिए इस अध्याय को शक्रादिस्तोत्र भी कहते हैं। इसकी बहुत महत्ता है और जो लोग सम्पूर्ण श्रीदुर्गासप्तशतीका पाठ नहीं कर पाते वे मात्र इसी अध्याय का पाठ कर मनोवांछित फल प्राप्त कर लेते हैं।

उत्तम चरित्र के नौवें और दसवें अध्याय में निशुम्भऔर शुम्भका वध वर्णित है, अत:दूसरी प्रमुख झांकी इसी से संबंधित होती है। इनके वध में देवी वाहन सिंह का भी महत्वपूर्ण योगदान था, अत:झांकी में सिंह की भूमिका भी प्रमुखता से दर्शाई जाती है। झांकियों के पास भी कलश स्थापन कर श्रीदुर्गासप्तशतीका नित्य पाठ सम्पन्न होता है। नवरात्रके नवों दिन सभी मंदिरों में श्रीदुर्गासप्तशतीका पाठ आयोजित होता है। नवरात्र-पूजाका प्रमुख अंग है दुर्गापाठ।जो लोग संस्कृत में पाठ नहीं कर सकते वे पुस्तकों में नीचे दिए हुए हिंदी अनुवाद का पाठ कर ही सफल काम हो जाते हैं। श्रीदुर्गासप्तशतीके पाठ का महत्व देखना हो तो कोई इस नवरात्रमें विंध्यवासिनी के प्रसिद्ध मंदिर में जाएं। वहां लाल वस्त्र धारण किए पाठकत्र्ताओंद्वारा मंदिर तो मंदिर उसके पास का बडा मैदान भी भर जाता है। इतना महत्व ही है श्रीदुर्गासप्तशतीपाठ का। इस संबंध में देवी-कथन उल्लेखनीय है-

न तेषांदुष्कृतं<न् द्धह्मद्गद्घ="द्वड्डद्बद्यह्लश्र:किञ्चिद">किञ्चिद्दुष्कृतोत्थान चापद:।भविष्यतिन दारिद्र्यंन चैवेष्टवियोजनम्॥

नवरात्रवस्तुत:नौ दुर्गाओंके पूजन-अर्चन का विधान है। दुर्गा के ये नौ रूप हैं-

प्रथमंशैलपुत्रीचद्वितीयंब्रह्मचारिणी।

तृतीयंचन्द्रघण्टेतिकूष्माण्डेतिचतुर्थकम्।।<न् द्धह्मद्गद्घ="द्वड्डद्बद्यह्लश्र:पञ्चमं">पञ्चमंस्कन्दमातेतिषष्ठंकात्यायनीतिच।सप्तमंकालरात्रीतिमहागौरीतिचाष्टमम्।नवमंसिद्धिदात्रीचनवदुर्गा: प्रकीर्तिता:।

प्रथम शैलपुत्री(हिमालयसुता पार्वती) हैं। इनका नौ दुर्गाओंमें सर्वोपरि स्थान है। द्वितीय ब्रह्मचारिणी तपस्वरूपाहैं। तप और तत्व ब्रह्मशब्द के बोधक हैं-वेदस्तत्वं तपो ब्रह्मवेद:।

तीसरी चन्द्रघंटाके मस्तक पर घंटे के आकार का अर्धचन्द्रहै। इनके दस हाथ हैं तथा सिंहवाहिनी हैं। नवरात्र-पूजामें इस दस-भुजा दुर्गा का विशेष महत्व है। चौथी कुष्मांडाअपने मधुर हास्य द्वारा अंड अर्थात् ब्रह्मांड को उत्पन्न करने वाली हैं। इनके पूर्व सर्वत्र जल ही जल था। सृष्टि की निर्माणकर्तृयही हैं। पांचवीं स्कन्दमातासुप्रसिद्ध देव योद्धा शिवपुत्रकार्तिकेय की माता हैं। यह पद्मासनाऔर शुभवर्णाहैं। छठी कात्यायनी भी बहुत प्रसिद्ध हैं। प्रसिद्ध कात्यायन ऋषि ने इन्हें पुत्री के रूप में प्राप्त करने के लिए इनकी तपस्या की थी। श्रीदुर्गासप्तशतीमें इन्हें सौम्य और त्रिलोचनासंबोधित किया गया है। सातवीं कालरात्रि का स्वरूप भयंकर है। केश बिखरे हैं। गर्दभ वाहन है। बाह्यरूप जितना विद्रूप है, आन्तरिक उतना ही कोमल।

सदा शुभ फलदायिनीहोने के कारण इनका एक नाम शुभंकरीभी है। आठवीं महागौरी,पूर्णत:गौर-वर्णा हैं। इनकी आयु आठ वर्ष सदा रहती है। नवीं सिद्धिदात्रीहै। नाम से ही इनका गुण विदित है।

डा. भगवतीशरण मिश्र

 
 

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