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भाईदूज क्यों मनाते हैं
Pro. Shiv Chandra Jha  Shiv.chandra@mithilalive.com
यह त्योहार कार्तिक शुक्ल की द्वितीया को मनाया जाता है।
यह भाई-बहन के प्रेम का प्रतीक है। बहन से तिलक लगवाना व बहन के घर भोजन करना अति शुभ फलदायी होता है।

इस दिन बहन भाई की पूजा कर उसकी दीर्घायु तथा अपने सुहाग की कामना से हाथ जोड़ यमराज से प्रार्थना करती है। इस दिन सूर्य तनया जमुना ने अपने भाई यमराज को भोजन करवाया था, इसे यम द्वितीया भी कहते हैं।

भाई-दूज (यम द्वितीया)

पौराणिक आख्यानों के अनुसार पूर्वकाल में यमराज को उनकी बहन यमुना ने अपने घर बुलाकर भोजन कराया था। भोजन से संतुष्ट यमराज ने अपनी बहन यमुना से वर माँगने को कहा था। वात्सल्यमयी यमुना ने यमराज से प्राणियों को अकाल मृत्यु व नरक भय से कष्ट-मुक्ति हेतु वर माँगा था। इसलिए यह पर्व यम द्वितीया (अथवा भाई-दूज) के रूप में जाना जाता है। नारद पुराण में उल्लेख है कि इस दिन भाई को अपनी बहन के घर जाकर भोजन करना चाहिए। उस दिन बहन को वस्त्र और आभूषण उपहार स्वरूप देकर बहन का आशीर्वाद प्राप्त करना चाहिए। सायंकाल यम की प्रसन्नतार्थ तेल का दीपक लगाकर दीप-दान करना चाहिए।

इस तरह धन त्रयोदशी से यम द्वितीया तक का पर्व-काल धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष प्रदान करने वाला है। यह पर्व-काल भारतीय संस्कृति में अनेक वर्षों से अनवरत रूप से चला आ रहा है। दीपावली-पर्व की विशेषता यह है कि इसमें देवताओं के पूजन, अर्चन, हवन आदि-आदि के लिए जाति-वर्ण, ऊँच-नीच, स्त्री-पुरुष, बालक, क्षेत्रीयता आदि का कोई भेद ही नहीं है। समस्त मानव जाति अपने आत्म कल्याणार्थ, मनोवांछित फल प्राप्ति हेतु इस पर्व को अपने-अपने ढंग से न केवल मनाते हैं बल्कि अपनी प्रसन्नता व खुशियों को समाज के अन्य अंगों के साथ मिल-जुलकर बाँटते हैं।

 

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