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ग्यारवाँ अध्याय
 
संजय उवाच

दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धानुलेपनम् ।
सर्वाश्चर्यमयं देवमनन्तं विश्वतोमुखम् ॥११- ११॥
उन्होंने दिव्य मालायें और दिव्य वस्त्र धारण किये हुये हैं, दिव्य गन्धों से लिपित हैं । सर्व ऍश्वर्यमयी वे देव अनन्त रुप हैं, विश्व रुप (हर ओर स्थित) हैं ।

दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता ।
यदि भाः सदृशी सा स्याद्भासस्तस्य महात्मनः ॥११- १२॥
यदि आकाश में हज़ार (सहस्र) सूर्य भी एक साथ उदय हो जायें, शायद ही वे उन महात्मा के समान प्रकाशमयी हो पायें ।

तत्रैकस्थं जगत्कृत्स्नं प्रविभक्तमनेकधा ।
अपश्यद्देवदेवस्य शरीरे पाण्डवस्तदा ॥११- १३॥
तब पाण्डव (अर्जुन) ने उन देवों के देव, भगवान् हरि के शरीर में एक स्थान पर स्थित, अनेक विभागों में बंटे संपूर्ण संसार (कृत्स्न जगत) को देखा ।

ततः स विस्मयाविष्टो हृष्टरोमा धनंजयः ।
प्रणम्य शिरसा देवं कृताञ्जलिरभाषत ॥११- १४॥
तब विस्मय (आश्चर्य) पू्र्ण होकर जिसके रोंगटे खड़े हो गये थे, उस धनंजयः ने उन देव को सिर झुका कर प्रणाम किया और हाथ जोड़ कर बोले ।

अर्जुन उवाच

पश्यामि देवांस्तव देव देहे सर्वांस्तथा भूतविशेषसंघान् ।
ब्रह्माणमीशं कमलासनस्थमृषींश्च सर्वानुरगांश्च दिव्यान् ॥११- १५॥
हे देव, मुझे आप के देह में सभी देवता और अन्य समस्त जीव समूह, कमल आसन पर स्थित ब्रह्मा ईश्वर, सभी ऋषि, और दिव्य सर्प दिख रहे हैं ।

अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रं पश्यामि त्वां सर्वतोऽनन्तरूपम् ।
नान्तं न मध्यं न पुनस्तवादिं पश्यामि विश्वेश्वर विश्वरूप ॥११- १६॥
अनेक बाहें, अनेक पेट, अनेक मुख, अनेक नेत्र, हे देव, मैं आप को हर जगह देख रहा हूँ, हे अनन्त रुप । ना मुझे आपका अन्त, न मध्य, और न ही आदि (शुरुआत) दिख रहा, हे विश्वेश्वर (विश्व के ईश्वर), हे विश्व रुप (विश्व का रुप धारण किये हुये) ।

किरीटिनं गदिनं चक्रिणं च तेजोराशिं सर्वतो दीप्तिमन्तम् ।
पश्यामि त्वां दुर्निरीक्ष्यं समन्ताद्दीप्तानलार्कद्युतिमप्रमेयम् ॥११- १७॥
मुकुट, गदा और चक्र धारण किये, और अपनी तेजोराशि से संपूर्ण दिशाओं को दीप्त करते हुये, हे भगवन्, आप को मैं देखता हूँ, लेकिन आपका निरीक्षण करना अत्यन्त कठिन है क्योंकि आप समस्त ओर से प्रकाशमयी, अप्रमेय (जिसके समान कोई न हो) तेजोमयी हैं ।

त्वमक्षरं परमं वेदितव्यं त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् ।
त्वमव्ययः शाश्वतधर्मगोप्ता सनातनस्त्वं पुरुषो मतो मे ॥११- १८॥
आप ही अक्षर (जिसका कभी नाश नहीं होता) हैं, आप ही परम हैं, आप ही जानना ज़रुरी है (जिन्हें जाना जाना चाहिये), आप ही इस विश्व के परम निधान (आश्रय) हैं । आप ही अव्यय (विकार हीन) हैं, मेरे मत में आप ही शाश्वत धर्म के रक्षक सनातन पुरुष हैं ।

अनादिमध्यान्तमनन्तवीर्यमनन्तबाहुं शशिसूर्यनेत्रम् ।
पश्यामि त्वां दीप्तहुताशवक्त्रं स्वतेजसा विश्वमिदं तपन्तम् ॥११- १९॥
आप आदि, मध्य और अन्त रहित (अनादिमध्यान्तम), अनन्त वीर्य (पराक्रम), अनन्त बाहू (बाजुयें) हैं । चन्द्र (शशि) और सूर्य आपके नेत्र हैं । हे भगवन, मैं आपके आग्नि पूर्ण प्रज्वलित वक्त्रों (मूँहों) को देखता हूँ जो अपने तेज से इस विश्व को तपा (गरमा) रहे हैं ।

द्यावापृथिव्योरिदमन्तरं हि व्याप्तं त्वयैकेन दिशश्च सर्वाः ।
दृष्ट्वाद्भुतं रूपमुग्रं तवेदं लोकत्रयं प्रव्यथितं महात्मन् ॥११- २०॥
स्वर्ग (आकाश) और पृथिवी के बीच में जो भी स्थान है, सभी दिशाओं में, वह केवल एक आप के द्वारा ही व्याप्त है (स्वर्ग से लेकर पृथिवी तक केवल आप ही हैं) । आप के इस अद्भुत उग्र (घोर) रूप को देख कर, हे महात्मा, तीनों लोक प्रव्यथित (भय व्याकुल) हो रहे हैं ।

अमी हि त्वां सुरसंघा विशन्ति केचिद्भीताः प्राञ्जलयो गृणन्ति ।
स्वस्तीत्युक्त्वा महर्षिसिद्धसंघाः स्तुवन्ति त्वां स्तुतिभिः पुष्कलाभिः ॥११- २१॥
आप ही में देवता गण प्रवेश कर रहे हैं । कुछ भयभीत हुये हाथ जोड़े आप की स्तुति कर रहे हैं । महर्षी और सिद्ध गण स्वस्ति (कल्याण हो) उच्चारण कर उत्तम स्तुतियों द्वारा आप की प्रशंसा कर रहे हैं ।

रुद्रादित्या वसवो ये च साध्या विश्वेऽश्विनौ मरुतश्चोष्मपाश्च ।
गन्धर्वयक्षासुरसिद्धसंघा वीक्षन्ते त्वां विस्मिताश्चैव सर्वे ॥११- २२॥
रूद्र, आदित्य, वसु, साध्य गण, विश्वदेव, अश्विनी कुमार, मरूत गण, पितृ गण, गन्धर्व, यक्ष, असुर, सिद्ध गण - सब आप को विस्मय से देखते हैं ।

रूपं महत्ते बहुवक्त्रनेत्रं महाबाहो बहुबाहूरुपादम् ।
बहूदरं बहुदंष्ट्राकरालं दृष्ट्वा लोकाः प्रव्यथितास्तथाहम् ॥११- २३॥
हे महाबाहो, बहुत से मुख, बहुत से नेत्र, बहुत सी बाहुयें, बहुत सी जँगाऐं (उरु), पैर, बहुत से उदर (पेट), बहुत से विकराल दांतो वाले इस महान् रूप को देख कर यह संसार प्रव्यथित (भयभीत) हो रहा है और मैं भी ।

नभःस्पृशं दीप्तमनेकवर्णं व्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम् ।
दृष्ट्वा हि त्वां प्रव्यथितान्तरात्मा धृतिं न विन्दामि शमं च विष्णो ॥११- २४॥
आकाश को छूते, अनेकों प्रकार (वर्णों) वाले आपके दीप्तमान रूप, जिनके खुले हुये विशाल मुख हैं और प्रज्वलित (दिप्तमान) विशाल नेत्र हैं - आपके इस रुप को देख कर मेरी अन्तर आत्मा भयभीत (प्रव्यथित) हो रही है । न मुझे धैर्य मिल रहा हैं, हे विष्णु, और न ही शान्ति ।

दंष्ट्राकरालानि च ते मुखानि दृष्ट्वैव कालानलसन्निभानि ।
दिशो न जाने न लभे च शर्म प्रसीद देवेश जगन्निवास ॥११- २५॥
आपके विकराल भयानक दाँतो को देख कर और काल-अग्नि के समान भयानक प्रज्वलित मुखों को देख कर मुझे दिशाओं कि सुध नहीं रही, न ही मुझे शान्ति प्राप्त हो रही है । प्रसन्न होईये हे देवेश (देवों के ईश), हे जगन्-निवास ।


॥ ॐ नमः भगवते वासुदेवाये ॥

 

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