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तेरहँवां अध्याय

श्रीभगवानुवाच

समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम् ।
विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति ॥१३- २७॥
परमात्मा सभी जीवों में एक से स्थित हैं । विनाश को प्राप्त होते इन जीवों में जो अविनाशी उन परमात्मा को देखता है, वही वास्तव में देखता है ।

समं पश्यन्हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम् ।
न हिनस्त्यात्मनात्मानं ततो याति परां गतिम् ॥१३- २८॥
हर जगह इश्वर को एक सा अवस्थित देखता हुआ जो मनुष्य सर्वत्र समता से देखता है, वह अपने ही आत्मन द्वारा अपनी हिंसा नहीं करता, इसलिये वह परम पति को प्राप्त करता है ।

प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः ।
यः पश्यति तथात्मानमकर्तारं स पश्यति ॥१३- २९॥
जो प्रकृति को ही हर प्रकार से सभी कर्म करते हुये देखता है, और स्वयं को अकर्ता (कर्म न करने वाला) जानता है, वही वास्तव में सत्य देखता है ।

यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति ।
तत एव च विस्तारं ब्रह्म संपद्यते तदा ॥१३- ३०॥
जब वह इन सभी जीवों के विविध भावों को एक ही जगह स्थित देखता है (प्रकृति में) और उसी एक कारण से यह सारा विस्तार देखता है, तब वह ब्रह्म को प्राप्त हो जाता है ।

अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्मायमव्ययः ।
शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते ॥१३- ३१॥
हे कौन्तेय, जीवात्मा अनादि और निर्गुण होने के कारण विकारहीन (अव्यय) परमात्मा तत्व ही है । यह शरीर में स्थित होते हुये भी न कुछ करती है और न ही लिपती है ।

यथा सर्वगतं सौक्ष्म्यादाकाशं नोपलिप्यते ।
सर्वत्रावस्थितो देहे तथात्मा नोपलिप्यते ॥१३- ३२॥
जैसे हर जगह फैला आकाश सूक्षम होने के कारण लिपता नहीं है उसी प्रकार हर जगह अवस्थित आत्मा भी देह से लिपती नहीं है ।

यथा प्रकाशयत्येकः कृत्स्नं लोकमिमं रविः ।
क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्स्नं प्रकाशयति भारत ॥१३- ३३॥
जैसे एक ही सूर्य इस संपूर्ण संसार को प्रकाशित कर देता है, उसी प्रकार हे भारत, क्षेत्री (आत्मा) भी क्षेत्र को प्रकाशित कर देती है ।

क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरेवमन्तरं ज्ञानचक्षुषा ।
भूतप्रकृतिमोक्षं च ये विदुर्यान्ति ते परम् ॥१३- ३४॥
इस पर्कार जो क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के बीच में ज्ञान दृष्टि से भेद देखते हैं और उन को अलग अलग जानते हैं, वे इस प्रकृति से विमुक्त हो परम गति को प्राप्त करते हैं ।
 
श्रीमद् भगवत गीता समाप्त
॥ ॐ नमः भगवते वासुदेवाये ॥

 

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