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| MithilaLive > साहित्य >>श्रीमद् भगवत गीता>> छटा अध्याय >>3 |
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शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति ॥६- १५॥ इस प्रकार योगी सदा अपने आप को नियमित करता हुआ, नियमित मन वाला, मुझ मे स्थित होने ने कारण परम शान्ति और निर्वाण प्राप्त करता है । नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः । न चाति स्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन ॥६- १६॥ हे अर्जुन, न बहुत खाने वाला योग प्राप्त करता है, न वह जो बहुत ही कम खाता है । न वह जो बहुत सोता है और न वह जो जागता ही रहता है । युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु । युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा ॥६- १७॥ जो नियमित आहार लेता है और नियमित निर-आहार रहता है, नियमित ही कर्म करता है, नियमित ही सोता और जागता है, उसके लिये यह योगा दुखों का अन्त कर देने वाली हो जाती है । यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते । निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा ॥६- १८॥ जब सवंयम ही उसका चित्त, बिना हलचल के और सभी कामनाओं से मुक्त, उसकी आत्मा मे विराजमान रहता है, तब उसे युक्त कहा जाता है । यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता । योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः ॥६- १९॥ जैसे एक दीपक वायु न होने पर हिलता नहीं है, उसी प्रकार योग द्वारा नियमित किया हुआ योगी का चित्त होता है । यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया । यत्र चैवात्मनात्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति ॥६- २०॥ जब उस योगी का चित्त योग द्वारा विषयों से हट जाता है तब वह सवयं अपनी आत्मा को सवयं अपनी आत्मा द्वारा देख तुष्ठ होता है । सुखमात्यन्तिकं यत्तद् बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम् । वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वतः ॥६- २१॥ वह अत्यन्त सुख जो इन्द्रियों से पार उसकी बुद्धि मे समाता है, उसे देख लेने के बाद योगी उसी मे स्थित रहता है और सार से हिलता नहीं । यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः । यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते ॥६- २२॥ तब बड़े से बड़ा लाभ प्राप्त कर लेने पर भी वह उसे अधिक नहीं मानता, और न ही, उस सुख में स्थित, वह भयानक से भयानक दुख से भी विचलित होता है । तं विद्याद्दुःखसंयोगवियोगं योगसंज्ञितम् । स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा ॥६- २३॥ दुख से जो जोड़ है उसके इस टुट जाने को ही योग का नाम दिया जाता है । निश्चय कर और पूरे मन से इस योग मे जुटना चाहिये । संकल्पप्रभवान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेषतः । मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः ॥६- २४॥ शुरू होने वालीं सभी कामनाओं को त्याग देने का संकल्प कर, मन से सभी इन्द्रियों को हर ओर से रोक कर । शनैः शनैरुपरमेद्बुद्ध्या धृतिगृहीतया । आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किंचिदपि चिन्तयेत् ॥६- २५॥ धीरे धीरे बुद्धि की स्थिरता ग्ररण करते हुऐ मन को आत्म मे स्थित कर, कुछ भी नहीं सोचना चाहिये । यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम् । ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत् ॥६- २६॥ ॥ ॐ नमः भगवते वासुदेवाये ॥ |
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