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| MithilaLive > साहित्य >>श्रीमद् भगवत गीता>> छटा अध्याय >>1 |
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युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी विगतकल्मषः । सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते ॥६- २८॥ अपनी आत्मा को सदा योग मे लगाये, पाप मुक्त हुआ योगी, आसानी से ब्रह्म से स्पर्श होने का अत्यन्त सुख भोगता है । सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि । ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः ॥६- २९॥ योग से युक्त आत्मा, अपनी आत्मा को सभी जीवों में देखते हुऐ और सभी जीवों मे अपनी आत्मा को देखते हुऐ हर जगह एक सा रहता है । यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति । तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति ॥६- ३०॥ जो मुझे हर जगह देखता है और हर चीज़ को मुझ में देखता है, उसके लिये मैं कभी ओझल नहीं होता और न ही वो मेरे लिये ओझल होता है । सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः । सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते ॥६- ३१॥ सभी भूतों में स्थित मुझे जो अन्नय भाव से स्थित हो कर भजता है, वह सब कुछ करते हुऐ भी मुझ ही में रहता है । आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन । सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः ॥६- ३२॥ हे अर्जुन, जो सदा दूसरों के दुख सुख और अपने दुख सुख को एक सा देखता है, वही योगी सबसे परम है । अर्जुन उवाच योऽयं योगस्त्वया प्रोक्तः साम्येन मधुसूदन । एतस्याहं न पश्यामि चञ्चलत्वात्स्थितिं स्थिराम् ॥६- ३३॥ हे मधुसूदन, जो आपने यह समता भरी योगा बताई है, इसमें मैं स्थिरता नहीं देख पा रहा हूँ, मन की चंचलता के कारण । चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम् । तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम् ॥६- ३४॥ हे कृष्ण, मन तो चंचल, हलचल भरा, बलवान और दृढ होता है । उसे रोक पाना तो मैं वैसे अत्यन्त कठिन मानता हूँ जैसे वायु को रोक पाना । श्रीभगवानुवाच असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम् । अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते ॥६- ३५॥ बेशक, हे महाबाहो, चंचल मन को रोक पाना कठिन है, लेकिन हे कौन्तेय, अभ्यास और वैराग्य से इसे काबू किया जा सकता है । असंयतात्मना योगो दुष्प्राप इति मे मतिः । वश्यात्मना तु यतता शक्योऽवाप्तुमुपायतः ॥६- ३६॥ मेरे मत में, आत्म संयम बिना योग प्राप्त करना अत्यन्त कठिन है । लेकिन अपने आप को वश मे कर अभ्यास द्वारा इसे प्राप्त किया जा सकता है । अर्जुन उवाच अयतिः श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानसः । अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति ॥६- ३७॥ हे कृष्ण, श्रद्धा होते हुए भी जिसका मन योग से हिल जाता है, योग सिद्धि को प्राप्त न कर पाने पर उसको क्या परिणाम होता है । कच्चिन्नोभयविभ्रष्टश्छिन्नाभ्रमिव नश्यति । अप्रतिष्ठो महाबाहो विमूढो ब्रह्मणः पथि ॥६- ३८॥ क्या वह दोनों पथों में असफल हुआ, टूटे बादल की तरह नष्ट नहीं हो जाता । हे महाबाहो, अप्रतिष्ठित और ब्रह्म पथ से विमूढ हुआ । एतन्मे संशयं कृष्ण छेत्तुमर्हस्यशेषतः । त्वदन्यः संशयस्यास्य छेत्ता न ह्युपपद्यते ॥६- ३९॥ हे कृष्ण, मेरे इस संशय को आप पूरी तरह मिटा दीजीऐ क्योंकि आप के अलावा और कोई नहीं है जो इस संशय को छेद पाये । श्रीभगवानुवाच पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते । न हि कल्याणकृत्कश्चिद्दुर्गतिं तात गच्छति ॥६- ४०॥ हे पार्थ, उसके लिये विनाश न यहाँ है और न कहीं और ही । क्योंकि, हे तात, कल्याण कारी कर्म करने वाला कभी दुर्गति को प्राप्त नहीं होता । प्राप्य पुण्यकृतां लोकानुषित्वा शाश्वतीः समाः । शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते ॥६- ४१॥ योग पथ में भ्रष्ट हुआ मनुष्य, पुन्यवान लोगों के लोकों को प्राप्त कर, वहाँ बहुत समय तक रहता है और फिर पवित्र और श्रीमान घर में जन्म लेता है । अथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम् । एतद्धि दुर्लभतरं लोके जन्म यदीदृशम् ॥६- ४२॥ या फिर वह बुद्धिमान योगियों के घर मे जन्म लेता है । ऍसा जन्म मिलना इस संसार में बहुत मुश्किल है । तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम् । यतते च ततो भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन ॥६- ४३॥ वहाँ उसे अपने पहले वाले जन्म की ही बुद्धि से फिर से संयोग प्राप्त होता है । फिर दोबारा अभ्यास करते हुऐ, हे कुरुनन्दन, वह सिद्धि प्राप्त करता है । पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोऽपि सः । जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते ॥६- ४४॥ पुर्व जन्म में किये अभ्यास की तरफ वह बिना वश ही खिच जाता है । क्योंकि योग मे जिज्ञासा रखने वाला भी वेदों से ऊपर उठ जाता है । प्रयत्नाद्यतमानस्तु योगी संशुद्धकिल्बिषः । अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम् ॥६- ४५॥ अनेक जन्मों मे किये प्रयत्न से योगी विशुद्ध और पाप मुक्त हो, अन्त में परम सिद्धि को प्राप्त कर लेता है । तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः । कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन ॥६- ४६॥ योगी तपस्वियों से अधिक है, विद्वानों से भी अधिक है, कर्म से जुड़े लोगों से भी अधिक है, इसलिये हे अर्जुन तुम योगी बनो । योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना । श्रद्धावान् भजते यो मां स मे युक्ततमो मतः ॥६- ४७॥ और सभी योगीयों में जो अन्तर आत्मा को मुझ में ही बसा कर श्रद्धा से मुझे याद करता है, वही सबसे उत्तम है । अध्याय समाप्त ॥ ॐ नमः भगवते वासुदेवाये ॥ |
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