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चौथा अध्याय
 
श्रीभगवान बोले

श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परन्तप ।
सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते ॥४-३३॥
हे परन्तप, धन आदि पदार्थों के यज्ञ से ज्ञान यज्ञ ज्यादा अच्छा है । सारे कर्म पूर्ण रूप से ज्ञान मिल जाने पर अन्त पाते हैं ॥

तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया ।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः ॥४-३४॥
सार को जानने वाले ज्ञानमंदों को तुम प्रणाम करो, उनसे प्रशन करो और उनकी सेवा करो ॥ वे तुम्हे ज्ञान मे उपदेश देंगे ॥

यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव ।
येन भूतान्यशेषेण द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि ॥४-३५॥
हे पाण्डव, उस ज्ञान में, जिसे जान लेने पर तुम फिर से मोहित नहीं होगे, और अशेष सभी जीवों को तुम अपने में अन्यथा मुझ मे देखोगे ॥




अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृत्तमः ।
सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं सन्तरिष्यसि ॥४-३६॥
यदि तुम सभी पाप करने वालों से भी अधिक पापी हो, तब भी ज्ञान रूपी नाव द्वारा तुम उन सब पापों को पार कर जाओगे ॥

यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन ।
ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा ॥४-३७॥
जैसे समृद्ध अग्नि भस्म कर डालती है, हे अर्जुन, उसी प्रकार ज्ञान अग्नि सभी कर्मों को भस्म कर डालती है ॥

न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते ।
तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति ॥४-३८॥
ज्ञान से अधिक पवित्र इस संसार पर और कुछ नहीं है । तुम सवयंम ही, योग में सिद्ध हो जाने पर, समय के साथ अपनी आत्मा में ज्ञान को प्राप्त करोगे ॥

श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः ।
ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति ॥४-३९॥
श्रद्धा रखने वाले, अपनी इन्द्रियों का संयम कर ज्ञान लभते हैं । और ज्ञान मिल जाने पर, जलद ही परम शान्ति को प्राप्त होते हैं ॥

अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति ।
नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः ॥४-४०॥
ज्ञानहीन और श्रद्धाहीन, शंकाओं मे डूबी आत्मा वालों का विनाश हो जाता है । न उनके लिये ये लोक है, न कोई और न ही शंका में डूबी आत्मा को कोई सुख है ॥

योगसंन्यस्तकर्माणं ज्ञानसंछिन्नसंशयम् ।
आत्मवन्तं न कर्माणि निबध्नन्ति धनंजय ॥४-४१॥
योग द्वारा कर्मों का त्याग किये हुआ, ज्ञान द्वारा शंकाओं को छिन्न भिन्न किया हुआ, आत्म मे स्थित व्यक्ति को कर्म नहीं बाँधते, हे धनंजय ॥

तस्मादज्ञानसम्भूतं हृत्स्थं ज्ञानासिनात्मनः ।
छित्त्वैनं संशयं योगमातिष्ठोत्तिष्ठ भारत ॥४-४२॥
इसलिये अज्ञान से जन्मे इस संशय को जो तुम्हारे हृदय मे घर किया हुआ है, ज्ञान रूपी तल्वार से चीर डालो, और योग को धारण कर उठो हे भारत ॥
 
चौथा अध्याय समाप्त
॥ ॐ नमः भगवते वासुदेवाये ॥

 

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