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| MithilaLive > साहित्य >>श्रीमद् भगवत गीता>> नौंवा अध्याय >>2 |
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अहं क्रतुरहं यज्ञः स्वधाहमहमौषधम् । मन्त्रोऽहमहमेवाज्यमहमग्निरहं हुतम् ॥९- १६॥ मैं क्रतु हूँ, मैं ही यज्ञ हूँ, स्वधा मैं हूँ, मैं ही औषधी हूँ । मन्त्र मैं हूँ, मैं ही घी हूँ, मैं अग्नि हूँ और यज्ञ में अर्पित करने का कर्म भी मैं ही हूँ । पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामहः । वेद्यं पवित्रमोंकार ऋक्साम यजुरेव च ॥९- १७॥ मैं इस जगत का पिता हूँ, माता भी, धाता भी और पितामहः (दादा) भी । मैं ही वेद्यं (जिसे जानना चाहिये) हूँ, पवित्र ॐ हूँ, और ऋग, साम, और यजुर भी मैं ही हूँ । गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत् । प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम् ॥९- १८॥ मैं ही गति (परिणाम) हूँ, भर्ता (भरण पोषण करने वाला) हूँ, प्रभु (स्वामी) हूँ, साक्षी हूँ, निवास स्थान हूँ, शरण देने वाला हूँ और सुहृद (मित्र अथवा भला चाहने वाला) हूँ । मैं ही उत्पत्ति हूँ, प्रलय हूँ, आधार (स्थान) हूँ, कोष हूँ । मैं ही विकारहीन अव्यय बीज हूँ । तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्णाम्युत्सृजामि च । अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन ॥९- १९॥ मैं ही भूमि को (सूर्य रूप से) तपाता हूँ और मैं ही जल को सोक कर वर्षा करता हूँ । मैं अमृत भी हूँ, मृत्यु भी, हे अर्जुन, और मैं ही सत् भी और असत् भी । त्रैविद्या मां सोमपाः पूतपापा यज्ञैरिष्ट्वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते । ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोकमश्नन्ति दिव्यान्दिवि देवभोगान् ॥९- २०॥ तीन वेदों (ऋग, साम, यजुर) के ज्ञाता, सोम (चन्द्र) रस का पान करने वाले, क्षीण पाप लोग स्वर्ग प्राप्ति की इच्छा से यज्ञों द्वारा मेरा पूजन करते हैं । उन पुण्य कर्मों के फल स्वरूप वे देवताओं के राजा इन्द्र के लोक को प्राप्त कर, देवताओं के दिव्य भोगों का भोग करते हैं । ॥ ॐ नमः भगवते वासुदेवाये ॥ |
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