| मिथिलालाइव साहित्य |
| MithilaLive > साहित्य >>श्रीमद् भगवत गीता>> दसवाँ अध्याय >>2 |
|
तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः । नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता ॥१०- ११॥ उन पर अपनी कृपा करने के लिये मैं उनके अन्तकरण में स्थित होकर, अज्ञान से उत्पन्न हुये उनके अँधकार को ज्ञान रूपी दीपक जला कर नष्ट कर देता हूँ । अर्जुन उवाच परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान् । पुरुषं शाश्वतं दिव्यमादिदेवमजं विभुम् ॥१०- १२॥ आप ही परम ब्रह्म हैं, आप ही परम धाम हैं, आप ही परम पवित्र हैं, आप ही दिव्य शाश्वत पुरुष हैं, आप ही हे विभु आदि देव हैं, अजम हैं । आहुस्त्वामृषयः सर्वे देवर्षिर्नारदस्तथा । असितो देवलो व्यासः स्वयं चैव ब्रवीषि मे ॥१०- १३॥ सभी ऋषि, देवर्षि नारद, असित, व्याल, व्यास जी आपको ऍसे ही बताते हैं । यहाँ तक की स्वयं आपने भी मुझ से यही कहा है । सर्वमेतदृतं मन्ये यन्मां वदसि केशव । न हि ते भगवन्व्यक्तिं विदुर्देवा न दानवाः ॥१०- १४॥ हे केशव, आपने मुझे जो कुछ भी बताया उस सब को मैं सत्य मानता हूँ । हे भगवन, आप के व्यक्त होने को न देवता जानते हैं और न ही दानव । स्वयमेवात्मनात्मानं वेत्थ त्वं पुरुषोत्तम । भूतभावन भूतेश देवदेव जगत्पते ॥१०- १५॥ स्वयं आप ही अपने आप को जानते हैं हे पुरुषोत्तम । हे भूत भावन (जीवों के जन्म दाता) । हे भूतेश (जीवों के ईश) । हे देवों के देव । हे जगतपति । वक्तुमर्हस्यशेषेण दिव्या ह्यात्मविभूतयः । याभिर्विभूतिभिर्लोकानिमांस्त्वं व्याप्य तिष्ठसि ॥१०- १६॥ आप जिन जिन विभूतियों से इस संसार में व्याप्त होकर विराजमान हैं, मुझे पुरी तरहं (अशेष) अपनी उन दिव्य आत्म विभूतियों का वर्णन कीजिय (आप ही करने में समर्थ हैं) । कथं विद्यामहं योगिंस्त्वां सदा परिचिन्तयन् । केषु केषु च भावेषु चिन्त्योऽसि भगवन्मया ॥१०- १७॥ हे योगी, मैं सदा आप का परिचिन्तन करता (आप के बारे में सोचता) हुआ किस प्रकार आप को जानूं (अर्थात किस प्रकार मैं आप का चिन्तन करूँ) । हे भगवन, मैं आपके किन किन भावों में आपका चिन्तन करूँ । विस्तरेणात्मनो योगं विभूतिं च जनार्दन । भूयः कथय तृप्तिर्हि शृण्वतो नास्ति मेऽमृतम् ॥१०- १८॥ हे जनार्दन, आप आपनी योग विभूतियों के विस्तार को फिर से मुझे बताइये, क्योंकि आपके वचनों रुपी इस अमृत का पान करते (सुनते) अभी मैं तृप्त नहीं हुआ हूँ । श्रीभगवानुवाच हन्त ते कथयिष्यामि दिव्या ह्यात्मविभूतयः । प्राधान्यतः कुरुश्रेष्ठ नास्त्यन्तो विस्तरस्य मे ॥१०- १९॥ मैं तुम्हें अपनी प्रधान प्रधान दिव्य आत्म विभूतियों के बारे में बताता हूँ क्योंकि हे कुरु श्रेष्ठ मेरे विसतार का कोई अन्त नहीं है । अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः । अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च ॥१०- २०॥ मैं आत्मा हूँ, हे गुडाकेश, सभी जीवों के अन्तकरण में स्थित । मैं ही सभी जीवों का आदि (जन्म), मध्य और अन्त भी हूँ । आदित्यानामहं विष्णुर्ज्योतिषां रविरंशुमान् । मरीचिर्मरुतामस्मि नक्षत्राणामहं शशी ॥१०- २१॥ आदित्यों (अदिति के पुत्रों) में मैं विष्णु हूँ । और ज्योतियों में किरणों युक्त सूर्य हूँ । मरुतों (49 मरुत नाम के देवताओं) में से मैं मरीचि हूँ । और नक्षत्रों में शशि (चन्द्र) । वेदानां सामवेदोऽस्मि देवानामस्मि वासवः । इन्द्रियाणां मनश्चास्मि भूतानामस्मि चेतना ॥१०- २२॥ वेदों में मैं साम वेद हूँ । देवताओं में इन्द्र । इन्द्रियों में मैं मन हूँ । और जीवों में चेतना । रुद्राणां शंकरश्चास्मि वित्तेशो यक्षरक्षसाम् । वसूनां पावकश्चास्मि मेरुः शिखरिणामहम् ॥१०- २३॥ रुद्रों में मैं शंकर (शिव जी) हूँ, और यक्ष एवं राक्षसों में कुबेर हूँ । वसुयों में मैं अग्नि (पावक) हूँ । और शिखर वाले पर्वतों में मैं मेरु हूँ । पुरोधसां च मुख्यं मां विद्धि पार्थ बृहस्पतिम् । सेनानीनामहं स्कन्दः सरसामस्मि सागरः ॥१०- २४॥ हे पार्थ तुम मुझे पुरोहितों में मुख्य बृहस्पति जानो । सेना पतियों में मुझे स्कन्ध जानो और जलाशयों में सागर । महर्षीणां भृगुरहं गिरामस्म्येकमक्षरम् । यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि स्थावराणां हिमालयः ॥१०- २५॥ महर्षीयों में मैं भृगु हूँ, शब्दों में मैं एक ही अक्षर ॐ हूँ । यज्ञों में मैं जप यज्ञ हूँ और न हिलने वालों में हिमालय । अश्वत्थः सर्ववृक्षाणां देवर्षीणां च नारदः । गन्धर्वाणां चित्ररथः सिद्धानां कपिलो मुनिः ॥१०- २६॥ सभी वृक्षों में मैं अश्वत्थ हूँ, और देव ऋर्षियों में नारद । गन्धर्वों में मैं चित्ररथ हूँ और सिद्धों में भगवान कपिल मुनि । ॥ ॐ नमः भगवते वासुदेवाये ॥ |
|
|
Feed Back - Refer To Friend - Terms Of Use- Privacy Policy- About Us - Contact Us - Careers -Advertise With Us © 2007 Adarsh Internet Pvt. Ltd. Benipatti Madhubani All Right Reserved info@mithilalive.com |