
गोधन (गोवर्धन) पूजा के दिन
गाय, बैल या बाछी के गोबर से गोधन की
आकृति बनाई जाती है। उसमें गोधन, गोधिनी, घर, जाँत-ढेंकी, ओखल, मूसल,
नाद, घोठा, आदि की आकृति बनायी जाती है। परिवा (अमावश्या के दूसरे दिन)
बैल से वह आकृति खनवायी जाती है, बैल बछड़े को नहलाकर नया पगहा लगाया
जाता है। उस दिन पशु से कोई काम नहीं लिया जाता।
परिवा के दूसरे दिन गोधन की पूजा होती
है, उसी दिन कुँवारी कन्यायें पीड़िया लगाती हैं और एक माह तक गीत मंगल
गायन के बाद उसे नदी में बहा देती हैं। पूर्णिमा के दिन चकवा-चकई दहवाया
जाता है, तुलसी-पौध के पास १५ दिन तक (अमावश्या से पूर्णिमा तक) दीपक
जलाया जाता है।
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