साहित्य में होली
प्राचीन काल के संस्कृत साहित्य में होली के अनेक रूपों का विस्तृत वर्णन
है। श्रीमद्भागवत महापुराण में रसों के समूह रास का वर्णन है। अन्य रचनाओं
में 'रंग' नामक उत्सव का वर्णन है जिनमें हर्ष की प्रियदर्शिका व
रत्नावली[क] तथा कालिदास की कुमारसंभवम् तथा मालविकाग्निमित्रम् शामिल
हैं। कालिदास रचित ऋतुसंहार में पूरा एक सर्ग ही 'वसन्तोत्सव' को अर्पित
है। भारवि, माघ और अन्य कई संस्कृत कवियों ने वसन्त की खूब चर्चा की है।
चंद बरदाई द्वारा रचित हिंदी के पहले महाकाव्य पृथ्वीराज रासो में होली
का वर्णन है। भक्तिकाल और रीतिकाल के हिन्दी साहित्य में होली और फाल्गुन
माह का विशिष्ट महत्व रहा है। आदिकालीन कवि विद्यापति से लेकर भक्तिकालीन
सूरदास, रहीम, रसखान, पद्माकर[ख] , जायसी, मीराबाई, कबीर और रीतिकालीन
बिहारी, केशव, घनानंद आदि अनेक कवियों को यह विषय प्रिय रहा है। महाकवि
सूरदास ने वसन्त एवं होली पर 78 पद लिखे हैं। पद्माकर ने भी होली विषयक
प्रचुर रचनाएँ की हैं।[२७] इस विषय के माध्यम से कवियों ने जहाँ एक ओर
नितान्त लौकिक नायक नायिका के बीच खेली गई अनुराग और प्रीति की होली का
वर्णन किया है, वहीं राधा कृष्ण के बीच खेली गई प्रेम और छेड़छाड़ से भरी
होली के माध्यम से सगुण साकार भक्तिमय प्रेम और निर्गुण निराकार भक्तिमय
प्रेम का निष्पादन कर डाला है।[२८] सूफ़ी संत हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया,
अमीर खुसरो और बहादुर शाह ज़फ़र जैसे मुस्लिम संप्रदाय का पालन करने वाले
कवियों ने भी होली पर सुंदर रचनाएँ लिखी हैं जो आज भी जन सामान्य में
लोकप्रिय हैं।[६] आधुनिक हिंदी कहानियों प्रेमचंद की राजा हरदोल, प्रभु
जोशी की अलग अलग तीलियाँ, तेजेंद्र शर्मा की एक बार फिर होली, ओम प्रकाश
अवस्थी की होली मंगलमय हो तथा स्वदेश राणा की हो ली में होली के अलग अलग
रूप देखने को मिलते हैं। भारतीय फ़िल्मों में भी होली के दृश्यों और गीतों
को सुंदरता के साथ चित्रित किया गया है। इस दृष्टि से शशि कपूर की उत्सव,
यश चोपड़ा की सिलसिला, वी शांताराम की झनक झनक पायल बाजे और नवरंग इत्यादि
उल्लेखनीय हैं।संगीत में होली
वसंत रागिनी- कोटा शैली में रागमाला शृंखला का एक लघुचित्रभारतीय
शास्त्रीय, उपशास्त्रीय, लोक तथा फ़िल्मी संगीत की परम्पराओं में होली का
विशेष महत्व है। शास्त्रीय संगीत में धमार का होली से गहरा संबंध है,
हाँलाँकि ध्रुपद, धमार, छोटे व बड़े ख्याल और ठुमरी में भी होली के गीतों
का सौंदर्य देखते ही बनता है। कथक नृत्य के साथ होली, धमार और ठुमरी पर
प्रस्तुत की जाने वाली अनेक सुंदर बंदिशें जैसे चलो गुंइयां आज खेलें होरी
कन्हैया घर आज भी अत्यंत लोकप्रिय हैं। ध्रुपद में गाये जाने वाली एक
लोकप्रिय बंदिश है खेलत हरी संग सकल, रंग भरी होरी सखी। भारतीय शास्त्रीय
संगीत में कुछ राग ऐसे हैं जिनमें होली के गीत विशेष रूप से गाए जाते
हैं। बसंत, बहार, हिंडोल और काफ़ी ऐसे ही राग हैं। होली पर गाने बजाने का
अपने आप वातावरण बन जाता है और जन जन पर इसका रंग छाने लगता है।
उपशास्त्रीय संगीत में चैती, दादरा और ठुमरी में अनेक प्रसिद्ध होलियाँ
हैं। होली के अवसर पर संगीत की लोकप्रियता का अंदाज़ इसी बात से लगाया जा
सकता है कि संगीत की एक विशेष शैली का नाम ही होली हैं, जिसमें अलग अलग
प्रांतों में होली के विभिन्न वर्णन सुनने को मिलते है जिसमें उस स्थान
का इतिहास और धार्मिक महत्व छुपा होता है। जहां ब्रजधाम में राधा और
कृष्ण के होली खेलने के वर्णन मिलते हैं वहीं अवध में राम और सीता के जैसे
होली खेलें रघुवीरा अवध में। राजस्थान के अजमेर शहर में ख्वाजा
मोईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पर गाई जाने वाली होली का विशेष रंग है। उनकी
एक प्रसिद्ध होली है आज रंग है री मन रंग है,अपने महबूब के घर रंग है
री।[३०] इसी प्रकार शंकर जी से संबंधित एक होली में दिगंबर खेले मसाने
में होली कह कर शिव द्वारा श्मशान में होली खेलने का वर्णन मिलता
हैं।ref>दिगंबर, खेलैं मसाने में होली। मोहल्ला। अभिगमन तिथि: 11 मार्च,
2008।</ref> भारतीय फिल्मों में भी अलग अलग रागों पर आधारित होली के गीत
प्रस्तुत किये गए हैं जो काफी लोकप्रिय हुए हैं। < 'सिलसिला' के गीत रंग
बरसे भीगे चुनर वाली, रंग बरसे और 'नवरंग' के आया होली का त्योहार, उड़े
रंगों की बौछार, को आज भी लोग भूल नहीं पाए हैं।
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