भारत में होली का उत्सव अलग-अलग प्रदेशों में भिन्नता के
साथ मनाया जाता है। ब्रज की होली आज भी सारे देश के आकर्षण का बिंदु होती
है। बरसाने की लठमार होली[१५] काफ़ी प्रसिद्ध है। इसमें पुरुष महिलाओं पर
रंग डालते हैं और महिलाएँ उन्हें लाठियों तथा कपड़े के बनाए गए कोड़ों से
मारती हैं। इसी प्रकार मथुरा और वृंदावन में भी १५ दिनों तक होली का पर्व
मनाया जाता है। कुमाऊँ की गीत बैठकी[१६] में शास्त्रीय संगीत की गोष्ठियाँ
होती हैं। यह सब होली के कई दिनों पहले शुरू हो जाता है। हरियाणा की
धुलंडी में भाभी द्वारा देवर को सताए जाने की प्रथा है। बंगाल की दोल
जात्रा[१७] चैतन्य महाप्रभु के जन्मदिन के रूप में मनाई जाती है। जलूस
निकलते हैं और गाना बजाना भी साथ रहता है। इसके अतिरिक्त महाराष्ट्र की
रंग पंचमी[१८] में सूखा गुलाल खेलने, गोवा के शिमगो[१९] में जलूस निकालने
के बाद सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन तथा पंजाब के होला मोहल्ला[२०]
में सिक्खों द्वारा शक्ति प्रदर्शन की परंपरा है। तमिलनाडु की कमन पोडिगई[२१]
मुख्य रूप से कामदेव की कथा पर आधारित वसंतोतसव है जबकि मणिपुर के
याओसांग[२२] में योंगसांग उस नन्हीं झोंपड़ी का नाम है जो पूर्णिमा के
दिन प्रत्येक नगर-ग्राम में नदी अथवा सरोवर के तट पर बनाई जाती है।
दक्षिण गुजरात के आदिवासियों के लिए होली सबसे बड़ा पर्व है, छत्तीसगढ़
की होरी[२३] में लोक गीतों की अद्भुत परंपरा है और मध्यप्रदेश के मालवा
अंचल के आदिवासी इलाकों में बेहद धूमधाम से मनाया जाता है भगोरिया[२४],
जो होली का ही एक रूप है। बिहार का फगुआ[२५] जम कर मौज मस्ती करने का
पर्व है और नेपाल की होली[२६] में इस पर धार्मिक व सांस्कृतिक रंग दिखाई
देता है। इसी प्रकार विभिन्न देशों में बसे प्रवासियों तथा धार्मिक
संस्थाओं जैसे इस्कॉन या वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर में अलग अलग
प्रकार से होली के शृंगार व उत्सव मनाने की परंपरा है जिसमें अनेक
समानताएँ और भिन्नताएँ हैं।