सोमवार
व्रतकथा :-
प्राचीन काल मॆ एक घनवान सॆठ था | जिसकॆ
यहां घन की कुछ भी कमी नही थी परन्तु सब कुछ हॊयॆ हुए भी उसॆ एक बडा भारी
दुख सन्तान न हॊनॆ का था और पुत्र प्रप्ति की चिन्ता मॆ हर समय बॆचैन रहता
था |वह पुत्र प्राप्ति की कामना सॆ प्रति सॊमवार कॊ भगवान शंकर का व्रत
और पुजन नियमानुसार करता था और सायंकाल कॊ मन्दिर मॆ घुप दीप जलाया करता
था| उसकी सच्ची भक्ति दॆखकर एक समय जगन्माता पार्वती नॆ भगवान भॊलॆ भंडारी
सॆ अनन्य विनती कॆ साथ हाथ जॊरकर कहा कि हॆ त्रिलॊकीनाथ यह सॆठ आपका भक्त
है इसलिए आप इस पर कूपा किजिए और इसकी मनॊकामना पुर्ण कर दीजिए |
भगवान शिव ने मुस्कराते
हुए कहा- 'हे पार्वती! इस संसार में सबको उसके कर्म के अनुसार फल की
प्राप्ति होती है। प्राणी जैसा कर्म करते हैं, उन्हें वैसा ही फल प्राप्त
होता है।'
इसके बावजूद पार्वतीजी नहीं
मानीं। उन्होंने आग्रह करते हुए कहा- 'नहीं प्राणनाथ! आपको इस व्यापारी
की इच्छा पूरी करनी ही पड़ेगी। यह आपका अनन्य भक्त है। प्रति सोमवार आपका
विधिवत व्रत रखता है और पूजा-अर्चना के बाद आपको भोग लगाकर एक समय भोजन
ग्रहण करता है। आपको इसे पुत्र-प्राप्ति का वरदान देना ही होगा।'
पार्वती का इतना आग्रह
देखकर भगवान शिव ने कहा- 'तुम्हारे आग्रह पर मैं इस व्यापारी को
पुत्र-प्राप्ति का वरदान देता हूँ। लेकिन इसका पुत्र 16 वर्ष से अधिक
जीवित नहीं रहेगा।'
उसी रात भगवान शिव ने
स्वप्न में उस व्यापारी को दर्शन देकर उसे पुत्र-प्राप्ति का वरदान दिया
और उसके पुत्र के 16 वर्ष तक जीवित रहने की बात भी बताई।
भगवान के वरदान से
व्यापारी को खुशी तो हुई, लेकिन पुत्र की अल्पायु की चिंता ने उस खुशी को
नष्ट कर दिया। व्यापारी पहले की तरह सोमवार का विधिवत व्रत करता रहा। कुछ
महीने पश्चात उसके घर अति सुंदर पुत्र उत्पन्न हुआ। पुत्र जन्म से
व्यापारी के घर में खुशियाँ भर गईं। बहुत धूमधाम से पुत्र-जन्म का समारोह
मनाया गया।
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