
व्यापारी को पुत्र-जन्म की अधिक खुशी नहीं हुई क्योंकि उसे
पुत्र की अल्प आयु के रहस्य का पता था। यह रहस्य घर में किसी को नहीं
मालूम था। विद्वान ब्राह्मणों ने उस पुत्र का नाम अमर रखा।
जब अमर 12 वर्ष का हुआ तो शिक्षा के लिए उसे वाराणसी भेजने का निश्चय हुआ।
व्यापारी ने अमर के मामा दीपचंद को बुलाया और कहा कि अमर को शिक्षा
प्राप्त करने के लिए वाराणसी छोड़ आओ। अमर अपने मामा के साथ शिक्षा
प्राप्त करने के लिए चल दिया। रास्ते में जहाँ भी अमर और दीपचंद रात्रि
विश्राम के लिए ठहरते, वहीं यज्ञ करते और ब्राह्मणों को भोजन कराते थे।
लंबी यात्रा के बाद अमर और दीपचंद एक नगर में पहुँचे। उस नगर के राजा की
कन्या के विवाह की खुशी में पूरे नगर को सजाया गया था। निश्चित समय पर
बारात आ गई लेकिन वर का पिता अपने बेटे के एक आँख से काने होने के कारण
बहुत चिंतित था। उसे इस बात का भय सता रहा था कि राजा को इस बात का पता
चलने पर कहीं वह विवाह से इनकार न कर दे। इससे उसकी बदनामी होगी।
वर के पिता ने अमर को देखा तो उसके मस्तिष्क में एक विचार आया। उसने सोचा
क्यों न इस लड़के को दूल्हा बनाकर राजकुमारी से विवाह करा दूँ। विवाह के
बादइसको धन देकर विदा कर दूँगा और राजकुमारी को अपने नगर में ले जाऊँगा।
वर के पिता ने इसी संबंध में अमर और दीपचंद से बात की। दीपचंद ने धन मिलने
के लालच में वर के पिता की बात स्वीकार कर ली। अमर को दूल्हे के वस्त्र
पहनाकर राजकुमारी चंद्रिका से विवाह करा दिया गया। राजा ने बहुत-सा धन
देकर राजकुमारी को विदा किया।
अमर जब लौट रहा था तो सच नहीं छिपा सका और उसने राजकुमारी की ओढ़नी पर लिख
दिया- 'राजकुमारी चंद्रिका, तुम्हारा विवाह तो मेरे साथ हुआ था, मैं तो
वाराणसी में शिक्षा प्राप्त करने जा रहा हूँ। अब तुम्हें जिस नवयुवक की
पत्नी बनना पड़ेगा, वह काना है।'
जब राजकुमारी ने अपनी ओढ़नी पर लिखा हुआ पढ़ा तो उसने काने लड़के के साथ जाने
से इनकार कर दिया। राजा ने सब बातें जानकर राजकुमारी को महल में रख लिया।
उधर अमर अपने मामा दीपचंद के साथ वाराणसी पहुँच गया। अमर ने गुरुकुल में
पढ़ना शुरू कर दिया।
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