जब
अमर की आयु 16 वर्ष पूरी हुई तो उसने एक यज्ञ किया। यज्ञ की समाप्ति पर
ब्राह्मणों को भोजन कराया और खूब अन्न, वस्त्र दान किए। रात को अमर अपने
शयनकक्ष में सो गया। शिव के वरदान के अनुसार शयनावस्था में ही अमर के
प्राण-पखेरू उड़ गए। सूर्योदय पर मामा अमर को मृत देखकर रोने-पीटने लगा।
आसपास के लोग भी एकत्र होकर दुःख प्रकट करने लगे।
मामा के रोने, विलाप करने
के स्वर समीप से गुजरते हुए भगवान शिव और माता पार्वती ने भी सुने।
पार्वतीजी ने भगवान से कहा- 'प्राणनाथ! मुझसे इसके रोने के स्वर सहन नहीं
हो रहे। आप इस व्यक्ति के कष्ट अवश्य दूर करें।'
भगवान शिव ने पार्वतीजी
के साथ अदृश्य रूप में समीप जाकर अमर को देखा तो पार्वतीजी से बोले- 'पार्वती!
यह तो उसी व्यापारी का पुत्र है। मैंने इसे 16 वर्ष की आयु का वरदान दिया
था। इसकी आयु तो पूरी हो गई।'
पार्वतीजी ने फिर भगवान
शिव से निवेदन किया- 'हे प्राणनाथ! आप इस लड़के को जीवित करें। नहीं तो
इसके माता-पिता पुत्र की मृत्यु के कारण रो-रोकर अपने प्राणों का त्याग
कर देंगे। इस लड़के का पिता तो आपका परम भक्त है। वर्षों से सोमवार का
व्रत करते हुए आपको भोग लगा रहा है।' पार्वती के आग्रह करने पर भगवान शिव
ने उस लड़के को जीवित होने का वरदान दिया और कुछ ही पल में वह जीवित होकर
उठ बैठा।
शिक्षा समाप्त करके अमर
मामा के साथ अपने नगर की ओर चल दिया। दोनों चलते हुए उसी नगर में पहुँचे,
जहाँ अमर का विवाह हुआ था। उस नगर में भी अमर ने यज्ञ का आयोजन किया।
समीप से गुजरते हुए नगर के राजा ने यज्ञ का आयोजन देखा।
राजा ने अमर को तुरंत
पहचान लिया। यज्ञ समाप्त होने पर राजा अमर और उसके मामा को महल में ले गया
और कुछ दिन उन्हें महल में रखकर बहुत-सा धन, वस्त्र देकर राजकुमारी के
साथ विदा किया।
रास्ते में सुरक्षा के
लिए राजा ने बहुत से सैनिकों को भी साथ भेजा। दीपचंद ने नगर में पहुँचते
ही एक दूत को घर भेजकर अपने आगमन की सूचना भेजी। अपने बेटे अमर के जीवित
वापस लौटने की सूचना से व्यापारी बहुत प्रसन्न हुआ।
व्यापारी ने अपनी पत्नी
के साथ स्वयं को एक कमरे में बंद कर रखा था। भूखे-प्यासे रहकर व्यापारी
और उसकी पत्नी बेटे की प्रतीक्षा कर रहे थे। उन्होंने प्रतिज्ञा कर रखी
थी कि यदि उन्हें अपने बेटे की मृत्यु का समाचार मिला तो दोनों अपने
प्राण त्याग देंगे।
व्यापारी अपनी पत्नी और
मित्रों के साथ नगर के द्वार पर पहुँचा। अपने बेटे के विवाह का समाचार
सुनकर, पुत्रवधू राजकुमारी चंद्रिका को देखकर उसकी खुशी का ठिकाना न रहा।
उसी रात भगवान शिव ने व्यापारी के स्वप्न में आकर कहा- 'हे श्रेष्ठी!
मैंने तेरे सोमवार के व्रत करने और व्रतकथा सुनने से प्रसन्न होकर तेरे
पुत्र को लंबी आयु प्रदान की है।' व्यापारी बहुत प्रसन्न हुआ।
सोमवार का व्रत करने से
व्यापारी के घर में खुशियाँ लौट आईं। शास्त्रों में लिखा है कि जो
स्त्री-पुरुष सोमवार का विधिवत व्रत करते और व्रतकथा सुनते हैं उनकी सभी
इच्छाएँ पूरी होती हैं।
|
|
|