सरस्वती श्वेत पद्म के
आसन पर विराजमान है। सरस्वती उपासक श्वेत अर्थात् विशुद्ध चरित्र का होना
चाहिए। उसका आसन पद्म का होना चाहिए, यह बात बहुत ही सूचक है। पद्म आसपास
के वातावरण से अलिप्त रहता है। कीचड़ में रहकर भी वह भ्रष्ट नहीं होता।
सरस्वती के उपासकों को भी अपने आसपास के समाज में प्रवर्तमान भ्रष्टाचार
से इसी तरह मुक्त रहना है।
ब्रह्मा, विष्णु और महेश
जैसे मुख्य देव माँ शारदा को वंदन करते हैं, उसमें भी रहस्य है। माँ
सरस्वती ज्ञान और भाव का प्रतीक है, यह बात उनके हाथ में की पुस्तक और
माला से समझ में आती है। पुस्तक ज्ञान का प्रतीक है और माला भक्ति प्रतीक
है। ब्रह्मा, विष्णु और महेश अनुक्रम में सर्जन, पालन और संहार के देव
हैं। इन तीनों को ज्ञान और भाव की जरूरत है।
बिना भाव का सृजन, बिना
ज्ञान का पालन और बुद्धिहीन संहार अनर्थ करता है। इसलिए किसी भी कार्य के
सृजन में, उस कार्य को टिकाने में और उस कार्य में घुसी हुई बुराई को दूर
करने के लिए ज्ञान और भाव दोनों जरूरी है और इसीलिए किसी भी महान कार्य
करने वाले महापुरुष को सरस्वती वंदना करनी ही चाहिए।
माँ सरस्वती हमारे जीवन
की जड़ता को दूर करती है, सिर्फ हमें उसकी योग्य अर्थ में उपासना करनी
चाहिए। सरस्वती का उपासक भोगों का गुलाम नहीं होना चाहिए। दूसरों की
संपत्ति देखकर मन में अस्वस्थता निर्माण नहीं होना चाहिए। उसे
निष्ठापूर्वक अपनी ज्ञानसाधना अखंड करते रहना चाहिए।
विद्वान मानव को धन का
अभाव कभी भी नहीं सालना चाहिए। धनिक मानव केवल भोग में ही आनंद को खोजने
में भटकता रहता है, जब कि विद्वान को वह आनंद निसर्ग-दर्शन से, जीवन के
भाव प्रसंगों और साहित्य के सृजन या आस्वादन से सहज प्राप्त होता है।
सरस्वती का वाहन मयूर है।
मोर कला का प्रतीक है। सरस्वती काल की भी देवी है। चौदह विद्या और चौसठ
कला ये सभी सरस्वती की उपासना में आती है। कला जीविका प्रदान करती है और
विद्या जीवन देती है। इस तरह सरस्वती हमारे समग्र अस्तित्व को आवृत्त करती
है। सरस्वती के उपासक की प्रतिष्ठा समाज करे या न करें, परन्तु ज्ञान के
वाहक के रूप में सम्मान करके भगवान अवश्य उसे अपने मस्तिष्क पर चढ़ाएँगे।
इस बात की प्रतीति भगवान
कृष्ण ने मोरपंख को अपने माथे पर चढ़ाकर दी है। श्रीमद् आद्य शंकराचार्य
गोपालकृष्ण को 'सुपिच्छगुच्छ मस्तकम्' कहकर उसकी विरुदावली गाते हैं।
समाज में मेरा योग्य सम्मान नहीं होता ऐसा जिस विद्वान को लगता हो उसे इस
संदर्भ में मोर और मोरपंख के बीच हुए संवाद स्वरूप नीचे का श्लोक हमेशा
याद रखना चाहिए-
'अस्मान्विचित्रवपुषस्तव
पृष्ठलग्नात्
कस्माद्विमुञ्चसि भवान
यदि वा विमुञ्च।
रे नीलकण्ठ
गुरुहानिरियं ततैव
गोपालसू नु मुकुटे भवति
स्थितिर्नः॥'
मोरपंख मोर से कहता है
कि, 'दीर्घकाल तक तेरी पीठ पर रहकर मैंने तेरी शोभा बढ़ाई है। मुझे तू अब
क्यों झटक देता है? अथवा तू मुझे भले ही छोड़ दें, परन्तु उसमें तेरा ही
नुकसान होने वाला है, तेरी शोभा नष्ट होने वाली है, मेरा स्थान तो भगवान
गोपालकृष्ण मुकुट में है।'
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