अपना तिरस्कार करने वाले
समाज को कोई भी सच्चा विद्वान उपरोक्त बात कह सकता है। समाज योग्य
विद्वानों का सम्मान नहीं करेगा तो उसमें नुकसान समाज का ही है। विद्वानों
को तो भगवान अपने सर पर चढ़ाने के लिए तैयार ही हैं।
इस बात को ध्यान में रखकर
सच्चे विद्वान को बड़प्पन प्राप्त करने के लिए कभी भी किसी की भी खुशामत
नहीं करनी चाहिए। लाचार या निस्तेज मानव को शारदा के मंदिर में प्रवेश नहीं
मिलता।
जीवन में तेजस्विता लाने
के लिए सरस्वती की उपासना करनी चाहिए। सच्चे सारस्वत को माँ शारदा के
मंदिर का पावित्र्य टिकाना चाहिए।
शारदा के मंदिर में कला
होनी चाहिए, परन्तु कला के स्वागत में विलासिता ने प्रवेश नहीं करना
चाहिए। शारदा के मंदिर में विद्या होनी चाहिए, परन्तु विद्या के नाम पर
अविद्या नहीं बेचनी चाहिए। शारदा के मंदिर में प्रेम होना चाहिए, परन्तु
प्रेम के नाम पर मोह नहीं उत्पन्न होना चाहिए। शारदा के मंदिर में दिव्यता
होनी चाहिए, परन्तु उन्मत्तता देखने को नहीं मिलनी चाहिए।
शारदा के मंदिर में नम्रता
होनी चाहिए, परन्तु नम्रता का स्वांग धारण करके लाचारी नहीं घुसनी चाहिए।
शारदा के मंदिर में प्राणों का प्रस्फुरण होना चाहिए, लेकिन निराशा के
निश्वास नहीं निकलने चाहिए।
शारदा नित्य यौवन,
स्तन्यदायिनी माता के समान है। वह अपने उपासक को जीवन देती है, उसके जीवन
में कवन (काव्य) सर्जती है और उसे अपनी शक्तियों का सच्चा अनुभव समझाती
है।
माँ
शारदा को लाख-लाख वंदन!
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